Fatskills
Practice. Master. Repeat.
Study Guide: छत्तीसगढ़ के प्रमुख सांस्कृतिक महोत्सव/मेले/ लोकोत्सव (Chhattisgarh GK in Hindi - Cultural Events & Fairs)
Source: https://www.fatskills.com/chhattisgarh-public-service-commission-cgpsc/chapter/-chhattisgarh-gk-in-hindi-cultural-events-fairs

छत्तीसगढ़ के प्रमुख सांस्कृतिक महोत्सव/मेले/ लोकोत्सव (Chhattisgarh GK in Hindi - Cultural Events & Fairs)

By Fatskills Exam Guides Team — the exam nerds behind 28,500+ quizzes and 2.1M practice questions across 500+ global exams.

⏱️ ~1 min read

रायपुर संभाग

छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्र रायपुर संभाग के अन्तर्गत आते हैं जिनमें प्रमुख मेलों का वितरण निम्नानुसार है- कर्णेंश्वर का मेला-देऊरपारा बुनेसर, सिहावा-धमतरी जिला
1. गिरौधपुरी का मेला-गिरौधपुर रायपुर जिला
2. बम्हनी का मेला-बम्हनी महासमुन्द जिला
3. माँ बंजारी धाम मेला-खपरी-भट्‌टी, तिल्दा रायपुर जिला
4. महादेव घाट का मेला-रायपुरा रायपुर जिला
5. राजिम का मेला-राजिम रायपुर जिला
6. डोंगापथरा मेला-खरेंगा धमतरी जिला
7. माँ बम्बलेश्वरी का मेला-डोंगरगढ़ राजनांदगाँव जिला
8. चम्पारण का मेला-चम्पारण रायपुर जिला
9. सिरपुर का मेला-सिरपुर महासमुंद जिला
10. शृंगी ऋषि का मेला-सिहावा धमतरी जिला
11. खल्लारी का मेला-खल्लारी महासमुंद जिला
12. नरसिंह मेला- रायपुर रायपुर जिला
13. चंडी मेला-बिरकोनी महासमुंद जिला
14. भोरमदेव मेला-भोरमदेव कवर्धा जिला
15. तुरतुरिया का मेला- तुरतुरिया (कसडोल) रायपुर जिला

बस्तर संभाग

▸ बस्तर संभाग में दिसम्बर माह में मँड़ई व मेले का शुभारंभ होता है। बस्तर की लोक संस्कृति, मेले और मँड़ई में अपने सम्पूर्ण उत्साह के साथ खिलखिलाँ उठती है।
▸ बस्तर का समस्त सांस्कृतिक जीवन इन दिनों उन्मुक्त हो उठता है। प्रकृति के ये वन्य पुत्र पूर्ण मौलिकता के साथ अपने लोक जीवन के आनंद का अमृतपान करते हैं।
▸ संभाग की प्रथम मँड़ई जगदलपुर से 22 मील दूर केशरपाल ग्राम में देवी माँ केशरपालिन के सम्मान में भरती है। बस्तर संभाग के अन्य प्रमुख मँड़ई मेलों के माह व स्थान जनवरी – कांकेर व चारामा के मेले फरवरी – अन्तागढ़, भानुप्रतापपुर, नारायणपुर व रामाराम के मेले मार्च – केशकाल, कोण्डागाँव व सकलनारायण के मेले
▸ सम्पूर्ण बस्तर के हर क्षेत्र में अपनी-अपनी परम्पराओं के अनुसार मँड़ई चलती है।
▸ मँड़ई के पहले दिन को देवता मँड़ई कहते हैं और दूसरे दिन को बासी मँड़ई कहते हैं।
▸ मँड़ई में आस-पास ग्राम के समस्त देवी-देवता आमंत्रित रहते हैं। विशेषकर इन मँड़ई व मेला में स्थानीय आंगा देव का विशिष्ट महत्व होता है।
▸ स्थानीय नियमों और परम्पराओं के अनुसार इनकी पूजा अर्चना होती है।

बिलासपुर संभाग

छत्तीसगढ़ के अविभाजित बिलासपुर संभाग में आयोजित होने वाले विविध मेले इस प्रकार हैं-
1. बिल्हा का मेला (माघपूर्णिमा) – बिलासपुर जिला
2. सेतगंगा का मेला (माघपूर्णिमा) – बिलासपुर जिला
3. मल्हार का मेला (महाशिवरात्रि) – बिलासपुर जिला
4. सेमरताल का मेला (महाशिवरात्रि) – बिलासपुर जिला
5. कनकी का मेला (महाशिवरात्रि) – बिलासपुर जिला

छत्तीसगढ़ में मेले

▸ मेला भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख अंग है। छत्तीसगढ़ में मेले यहाँ के आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक व धार्मिक विविधाताओं के अपूर्व संगम है। छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक मेले मार्च-अप्रैल में लगते हैं।
▸ वस्तुत: छत्तीसगढ़ी संस्कृति में मेले जन आस्था एवं असीम लोकप्रेम की अभिव्यक्ति हैं। इन सब के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ के जनजाति क्षेत्रों में आयोजित होने वाली मंड़इयां भी मिथकीय महत्व को आस्था पूर्वक ग्रहण करती है।
▸ छत्तीसगढ़ में मेलों की विधिवत गणना सन्‌ 1961 में हुई थी। उस समय सर्वाधिक मेले अविभाजित बिलासपुर संभाग में 79 दर्ज किये गये थे एवं रायपुर संभाग में 78
मेले की गणना हुई थी।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख मेले
विश्व प्रसिद्ध बस्तर का दशहरा मेला
▸ यह छत्तीसगढ़ का विश्व विख्यात वनवासी अंचल का सर्वमान्य व सर्वोपरि उत्सव है।
▸ बस्तर के आदिवासी अंचल में मनाये जाने वाला दशहरा विजयदशमी के प्राचीन परम्परा का संवाहक है।
▸ अपितु इसमें बस्तर की आदिम आदिवासी राज-संस्कृति के विशिष्ट तत्व समाहित है।
▸ इस वर्ष का प्रारंभ काकतीय राजवंश के चतुर्थ नरेश पुरुषोत्तम देव (सन्‌ 1408 से
1439) के समय से माना जाता है।
▸ यह दशहरा राज परिवार द्वारा उल्लासपूर्वक 10 दिनों तक मनाया जाता है।
▸ वैसे इसका उत्सव क्रम 75 दिनों तक चलता रहता है।
▸ इस उत्सवपूर्ण सांस्कृतिक मेले को देखने के लिए न सिर्फ भारत के कोने-कोने से अपितु विश्व के पर्यटन प्रेमियों का ताँता लगा रहता है।
▸ बस्तर मे दशहरा पर्व का आरम्भ काछिन-गादी नामक परम्परा से होता है, जिसमें बस्तर का राजा हाथी पर सवार होकर काछिन गुड़ी से निर्विघ्न दशहरा समाप्त होने का विनय करते हैं।
▸ इस गुड़ी में उस दिन 9 वर्ष की मिरगान कुँआरी कन्या के ऊपर देव आता है।
▸ प्रतिवर्ष इस हेतु अलग-अलग कन्या का चयन होता है।
▸ मिरगान कुआरी कन्या काँटेदार झूले आदि पर लेटकर अन्य कई रस्मों को पूरा कर यदि अपने गले से माला पुजारी को देती है तो समझा जाता है दशहरा निर्विघ्न सम्पन्न होगा।
▸ बस्तर का यह महापर्व आपसी सद्‌भावना व प्रेम का पुरातन संस्कृति के प्रति गहन निष्ठा का प्रतीक है।
▸ अपनी अनेक विशिष्टताओं के कारण बस्तर की लोक संस्कृति का यह ऐतिहासिक उत्सव विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुका है।

राजिम का प्रसिद्ध मेला

▸ छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहे जाने वाले राजिम को 'पद्‌मावतीपुरी' 'पंचकोशी' एंव छोटा काशी के नामों से भी पहचाना जाता है।
▸ यह छत्तीसगढ़ की गंगा महानदी, पैरी एवं सोंढूर नदियों का पवित्र संगम स्थल है, इसलिए धार्मिक दृष्टि से राजिम को छत्तीसगढ़ का प्रयाग माना गया है।
▸ इस महान धार्मिक क्षेत्र में प्रति वर्ष फरवरी से मार्च माह (माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक) में एक माह तक प्रसिद्ध मेले का आयोजन होता है जो कि महाशिवरात्रि के दिन अत्यधिक विशाल हो जाता है। शिवरीनारायण मेला
▸ बिलासपुर से 65 किमी. दूर जांजगीर-चांपा जिले में स्थित शिवरीनारायण पुरातन धार्मिक स्थल है।
▸ छत्तीसगढ़ तीन पावन नदियों-महानदी, शिवनाथ एवं जोंक का संगम प्रयाग के त्रिवेणी संगम की तरह प्रसिद्ध है।
▸ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर शिवरीनारायण में विशाल मेला आयोजित होता है, जो लगभग एक पखवाड़े तक चलता है।

चम्पारण का मेला

▸ राजिम से 9 कि.मी. एवं रायपुर से 56 किमी. की दूरी पर बल्लभ संप्रदाय के प्रणेता प्रसिद्ध वैष्णव संत महाप्रभु बल्लभाचार्य की जन्म स्थली चम्पाझर ग्राम है।
▸ महाप्रभु की जन्मस्थली होने के कारण देश-विदेश के वैष्णवजनों का आगमन लाखों की संख्या में होता है।
▸ महाप्रभु की 84 बैठकों में चम्पारण का एक अत्यधिक महत्वपूर्ण बैठक है।

माँ बम्लेश्वरी मेला

▸ राजांदगाँव जिले से 36 किमी दूरी पर डोंगरगढ़ स्थित है।
▸ छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ म्लेश्वरी का मंदिर यहाँ की प्रसिद्ध पहाड़ी के अंतिम शिखर पर अवस्थित है।
▸ माँ बम्लेश्वरी मंदिर में हजारों की संख्या में आस्था के प्रतीक ज्योति कलश की स्थापना की जाती है।

रतनपुर का मेला

▸ रतनपुर बिलासपुर का प्रमुख ऐतिहासिक व धार्मिक स्थल है जो बिलासपुर नगरी से लगभग 25 किमी. की दूरी पर स्थित है।
▸ छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कल्चुरीवंश एवं मराठों ने इस नगरी को अपनी राजधानी बनाया था।
▸ कल्चुरी नरेश राजा रत्नसेन ने 11वीं शताब्दी में नगर के मध्य माँ महामाया का प्रसिद्ध मंदिर निर्मित करवाया था।
▸ चैत्र एवं क्वांर नवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है।

सिरपुर का मेला

▸ 'चित्रांगदपुर' के नाम से प्रसिद्ध वर्तमान सिरपुर महानदी के तट पर स्थित है।
▸ महासमुंद जिले का यह प्रसिद्ध ऐतिहासिक धार्मिक स्थल है। कालांतर में यह ग्राम शरभपुरी वंश एवं 'पांडुवंशीय राजाओं की राजधानी रहा है।
▸ यह छत्तीसगढ़ की प्राचीन बौद्ध नगरी है, जहाँ पर ह्वेन-सांग जैसे तीर्थ यात्रियों ने यात्रा की थी।

सिहावा का शृंगी ऋषि का मेला

▸ धमतरी नगर से 65 किमी. की दूरी पर सघन वनों एवं पहाड़ियों से घिरा हुआ सिहावा का प्रमुख ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं धार्मिक स्थल है। शृंगी ऋषि के आश्रम के समीप जलकुण्ड से छत्तीसगढ़ की गंगा चित्रोत्पला महानदी का उद्‌गम हुआ है।
▸ यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को विशाल मेला आयोजित होता है जिसमें हजारों की संख्या में जनसमुदाय भाग लेता है।

शंकरजी का मेला

▸ बिलासपुर के कनकी स्थान पर 130 वर्षों से यह मेला लग रहा है। सात दिन तक चलने वाला यह मेला महाशिवरात्रि के अवसर पर लगता है।
▸ यह मेला अपनी चमत्कारिक कथाओं के कारण श्रद्धालुओं में अत्यंत ही प्रसिद्ध है।

नारायणपुर का मेला

▸ बस्तर जिले के कोडागाँव तहसील से 51 किमी. दूर घने वनप्रांत में नैसर्गिक धरोहर के मध्य नारायणपुर स्थित है।
▸ फरवरी माह में यहाँ लोक जीवन से रचा बसा नारायणपुर का विश्व प्रसिद्ध मेला आयोजित होता है।
▸ इस मेले में वनवासी जीवन की सुंदर झांकी एवं उनके आंतरिक रीतिरिवाज अपनी सम्पूर्ण भावनाओं के साथ व्यक्त होते हैं।
▸ प्रकृति-पुत्रों के रोमांचक जीवन शैली का नजारा लेने के लिए देश विदेशों से पर्यटक आते हैं।

बस्तर दशहरा

▸ बस्तर में दशहरा धार्मिक और शाही परंपरा का मिसाल है। जब देश के बाकी हिस्से दशहरा मनाने के लिए खुद को तैयार करते हैं जो बुराई में अच्छाई की जीत पर प्रकाश डालता है, बस्तर के आदिवासी (छत्तीसगढ़ का दक्षिणी भाग) भी उस वक्त उत्सव मनाते हैं, परन्तु किसी और कारण से।
▸ यह राम द्वारा रावण के वध की खुशी नें नहीं मनाया जाता, परन्तु बस्तर के राजा को
800 साल पहले जगन्नाथ मंदिर में रथपति की उपाधि दी गई थी। उस उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
▸ यहाँ ये बात अनोखी लगे, परन्तु रावण को बस्तर में समादर दी जाती है। दण्डकारण्य (बस्तर का विशाल वन क्षेत्र और उसके आगे) का क्षेत्र रावण और उसकी बहन शूर्पणखा के अधिकार क्षेत्र आता था।
▸ इतिहास यह है कि, 1408 ई. में चक्रकोट (बस्तर का पुराना नाम) के राजा पुरषोत्तम देव भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, एक बार वह अपनी राजधानी, बड़े डोंगर (नारायणपुर) से भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद लेने पैदल ही पुरी चले गये।
▸ वहाँ भगवान जगन्नाथ ने पुजारी के सपने में निर्देश दिया कि, राजा को रथपति का खिताब प्रदान कर, उन्हें 16 चक्र वाला रथ दे दिया जाये।
▸ पूर्व में राजा विजय दशमी के दिन आकर्षक रूप में सजाए रथ पर बैठते थे, परन्तु अब दंतेवाड़ा की प्रसिद्ध दंतेश्वरी माई की मूर्ति को रथ में रखकर घुमाया जाता है। लेकिन तत्कालीन राजा को लगता है कि चीजें वर्षों में बदल गई हैं।
▸ रथ चलाने का समारोह नवरात्रि के दूसरे दिन से शुरू होता है, जब एक चार पहियों वाला रथ शहर के मध्य से ले जाया जाता है और यह अनुष्ठान पूरे सात दिनों तक चलता है इसे फूलों से सजाया जाता है इसलिए इसे फूल रथ भी कहते हैं। अन्य प्रमुख उत्सव समारोह स्थान रामगढ़ महोत्सव उदयपुर(सरगुजा) भोरमदेव उत्सव कवर्धा खल्लारी महोत्सव महासमुंद चक्रधर समारोह रायगढ़ लोक मड़ई राजनांदगाँव करिया धुर्वा मेला महासमुंद कबीरपंथी मेला दामाखेड़ा, रायपुर गढ़िया महोत्सव कांकेर रतनपुर महोत्सव बिलासपुर राजीव लोचन महोत्सव राजिम, रायपुर बस्तर लोकोत्सव जगदलपुर सिरपुर महोत्सव महासमुंद डोंगरगढ़ महोत्सव राजनांदगाँव बिलासा महोत्सव बिलासपुर जाजल्यदेव महोत्सव जांजगीर शिवरीनारायण महोत्सव जांजगीर मल्हार महोत्सव बिलासपुर