छोड़ो भी, ऐसा तो जीवन में होता है, जो कभी मिलता है, वह कभी छिनता है। लेकिन इससे डरकर संध्या के सिंदूरी प्रकाश मे मंजरित तुलसी के नीचे दीया जलाना थोड़े ही बंद किया जाता है। भगवान वात सुनें, न सुनें, तो भी गंदिर तो मंदिर ही है, उसमें जो रोज शाम दीया नहीं जलाता है, वह तो घर लौटने के अपने ही मार्ग पर अँधेरा फैलाता है।
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