पौ फटते ही उठ जाती हैं स्त्रियाँ बुहारती हैं झाडू और फिर पानी के बर्तनों की खनकती हैं आवाजें पायल की झंकार और चूड़ियों की खनक से गूंज जाता है गली-मुहल्ले का नुक्कड़ जहाँ करती हैं स्त्रियाँ इंतजार कतारबद्ध हो पानी के आने का। होती हैं चिंता पति के ऑफिस जाने की और बच्चों के लंच बॉक्स तैयार करने को, देखते ही देखत हो जाती हैं दोपहर अब स्त्री को इंतजार होता है बच्चों के स्कूल से लौटने का और फिर धीरे-धीरे ढल जाती है शाम भी उसके माथे की बिंदी अब चमकने लगती है पति के इंतजार में और फिर होता उसे पौ फटने का अगला इंतजार!!
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