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ऋतु वसन्त तुम आओ ना, वासन्ती रंग बिखराओ ना। उजड़ रही आमों की बगिया, बौर नये महकाओ ना। सूनी वन-उपवन की डालें, कोयल को बुलवाओ ना। नूतन गीत सुनाओ ना, ओ वसन्त तुम आओ ना। ऊँचे-ऊँचे महलों में, देखो जाम छलकते हैं…। कहीं अँधेरी झोपड़ियों में, दुधमुँहे रोज बिलखते हैं। कुटिया के बुझते दीपक को, वनकर तेल जलाओ ना… भूखी माँ के आँचल में तुम, दूध की धार बहाओ ना… प्रिय वसन्त तुम आओ ना… कोई धोता जूठे बर्तन, कोई कूड़ा बीन रहा। पेट की आग मिटाने को, रोटी कोई छीन रहा। काम पे जाते बच्चे के, हाथों में किताब थमाओ ना… घना अँधेरा छाया है, तुम ज्ञान के दीप जलाओ ना… ऋतु वसंत तुम आओ ना।
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