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अनुशासन का पालन करना शिष्टाचार का ही एक अंग है। यह अनुशासन सामाजिक भी हो सकता है और कानूनी भी। मन्दिर-मस्जिद और गुरुद्वारे में प्रवेश करने से पहले जूते-चप्पल उतार देने चाहिए। किसी भी सभा में शोर नहीं करना चाहिए। सभा में कुर्सी या मेज पर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिए। ये सारे गुण सामाजिक अनुशासन के उदाहरण हैं। सड़क पर हमेशा बायीं ओर चलना चाहिए। रेलगाड़ी या बस में धूम्रपान नहीं करना चाहिए। ये कानूनी अनुशासन के उदाहरण हैं। शिष्टाचार के इन नियमों का पालन नहीं करने से परिवार, समाज, कार्यालय, सर्वत्र कुव्यवस्था फैलने का भय बना रहता है। संक्षेप में, चाहे घर हो, दुकान हो या कार्यालय, सर्वत्र शिष्टाचार के सहारे हम प्रशंसा एवं सफलता के पात्र बन सकते हैं। इसके ठीक विपरीत अशिष्ट व्यवहार से दूसरों का दिल तो दुखता ही है, हमें भी बदले में दुःख और असफलता हाथ लगती है। शिष्टाचार से पग-पग पर मित्र उत्पन्न होते हैं और अशिष्ट व्यवहार से पग-पग पर दुश्मन।
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