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मित्रता जितनी बहुमूल्य है, उसे बनाए रखना भी उतना ही कठिन है। मित्रता को स्थिर और दृढ़ रखने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है सहिष्णुता और उदारता की। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमी रहती है। पूर्ण निर्दोष और गुण सम्पन्न व्यक्ति कोई भी नहीं होता। अतः मित्र के अवगुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। अन्यथा दोष-दर्शन और एक दूसरे पर छींटाकशी से मित्रता में दरार पैदा होने का भय बना रहता है। आज भौतिकवादी युग है। इस युग में सच्चे मित्र का मिलना कठिन है। अधिकतर मित्र अपना उल्लू सीधा करने के। लिए मित्रता का स्वांग रचते हैं और अपना काम बन जाने के बाद अँगूठा दिखाकर चलते बनते हैं। ऐसे मित्र सामने प्रिय बोलते हैं, लेकिन पीछे विषवमन करते हैं। अतः शास्त्रों का मत है कि ऐसे मित्र सिर्फ मुख पर अमृत वाले और सम्पूर्ण भाग विष से भरे घट के समान त्याज्य हैं।
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