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जब कोई वीर पुरुष किसी को क्षमा करता है तो वह सुनने और देखने में अच्छा लगता है। लेकिन जब कोई कायर और कमजोर व्यक्ति किसी को क्षमा करने की बात करता है, तो यह उपहास की बात हो जाती है। यदि हम अपने को बड़ा मानते हैं, हम बलशाली और विद्वान हैं, हम बड़े प्रबुद्ध हैं, तो फिर यही क्षमा हमारे जीवन का अलंकार बन जाता है। शिक्षक बच्चों को पढाते हैं, बच्चों का काम होता है-भूल करना। यदि शिक्षक उनकी भूलों को क्षमा कर देते हैं तो यहाँ शिक्षक की गरिमा बढ़ती है, मर्यादा बढ़ती है। इससे उनको सपि का परिचय मिलता है. लेकिन यदि बच्चों को उनकी किसी प्रकार की छोटी-मोटी भूलों के लिए सजा दी जाए, उन्हें पीटा जाए, डॉटा-फटकारा जाए, उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास किया जाए तो उस व्यक्ति या शिक्षक को हम क्षमाशील नहीं कह सकते। ऐसा करना हमारी भूल ही होगी।
यह हमारी कौन-सी महानता होगी कि किसी ने कुछ भूल कर दी और हमने उसके बदले उसे दो हाथ लगा दिए। मनुष्य के समान कोई दूसरा आत्मघाती जीव इस संसार में खोजना मुश्किल है। इस संसार में सिर्फ मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो सिर्फ अपना ही नुकसान करने के पीछे पड़ा रहता है। इसके सिवा संसार में ऐसा और कोई दूसरा जीव नहीं है, जो अपना नुकसान करने की ताक में लगा रहता हो। हम जो भूल करते चले जा रहे हैं, उससे हमारे ही शरीर का क्षय होता है, हमारा ही शरीर टूटता है, विकृत होता जा रहा है। फिर भी मनुष्य गलती पर गलती करता चला जा रहा है।
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