Fast review mode: answers are shown by default so you can skim quickly. Hide them if you want to self-test.
लोग चाहते हैं कि सरकार उनकी भलाई के लिए कार्य करती रहे और वे स्वयं कुछ न करें। गाँधी जी के सिद्धांतों पर चलने की अपेक्षा भी अधिकतर लोग दूसरों से ही कहते हैं जबकि स्वयं उन पर चलना नहीं चाहते। गाँधी जी किसी गरीब को भोजन देने के बजाए उसके लिए काम उपलब्ध कराने की बात करते थे। वे खैरात बाँटने का खुला विरोध करते थे। उनका कहना था-भगवान हमारा नौकर नहीं है, जो हमारे काम कर जाए। काम तो हमें ही करना पडेगा। सच है कि हम गाँधी जी के बताये रास्ते से हट गए हैं। हम चाहते हैं कि हमारा काम सरकार करे या कोई और करे। अपने अधिकार हमें याद हैं, परंतु समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को हम भूल गए हैं। हम अकर्मण्यता के दलदल में धंसते जा रहे हैं। कर्म संस्कृति की सोच हमने क्षीण कर दी है। भ्रष्टाचार का विरोध करने के बजाए हम अपनी सुविधा देखते हैं। सड़क पर यातायात का पहले हम उल्लघंन करते हैं और पकड़े जाने पर जुर्माना देने के बजाए कम रकम में पुलिस से समझौते की फिराक में रहते हैं और इसके बाद पुलिस को भ्रष्ट बताते हैं। गम्भीरता से सोचें, तो जहाँ भी हमें घूस देनी पड़ रही है, वहाँ कुछ न कुछ हमारे आचार-व्यवहार में कमी अवश्य होती है। जहाँ कमी नहीं होती, वहाँ घूस इसलिए देनी पड़ती है, क्योंकि भेड़िए के मुँह में खून लग चुका होता है। गाँधी की राह पर अंश भर चलकर तो देखें, चारों ओर खुशहाली ही होगी।
Join 4M+ learners. Unlock unlimited quizzes, wrong-answer tracking, flashcards + reminders, study guides, and 1-on-1 challenges.