किंसुक-पुंज से फूलि रहे सु लगी उर दौ जु वियोग तिहारे। मातो फिरै‚ न घिरै अबलानि पै‚ जान मनोज यों डारत मारे। ह्‌वै अभिलाषनि पात निपात कढ़े हिय-सूल उसांसनि डारे। है पतझार बसंत दुहूँ घनआनंद एकहि बार हमारे॥ इन पंक्तियों में भावाभिव्यंजना के कौन-कौन रूप व्यक्त हुए हैं?

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किंसुक-पुंज से फूलि रहे सु लगी उर दौ जु वियोग तिहारे। मातो फिरै‚ न घिरै अबलानि पै‚ जान मनोज यों डारत मारे। ह्‌वै अभिलाषनि पात निपात कढ़े हिय-सूल उसांसनि डारे। है पतझार बसंत दुहूँ घनआनंद एकहि बार हमारे॥ इन पंक्तियों में भावाभिव्यंजना के कौन-कौन रूप व्यक्त हुए हैं?