निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इससे सम्बन्धित छ: प्रश्नों के उत्तर दीजिए : आधुनिकीकरण के इस युग में अत्यधिक गति और आवश्यकतामूलक परिस्थितियों के कारण असन्तुलन एवं तनाव उत्पन्न होता है जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होती है। अति पसन्द और नापसन्द के कारण भावात्मक स्तर पर असन्तुलन के कारण आवेग प्रकट होते हैं। मनोवैज्ञानिक स्तर पर होने वाले असन्तुलन द्वन्द्व को जन्म देते हैं और बहुत बार संकीर्ण अहं-केन्द्रित व्यवहार के रूप में प्रदर्शित होते है। सूक्ष्म स्तर पर असन्तुतिल दृष्टिकोण और समग्र ज्ञान का अभाव स्थूल स्तर पर असन्तुलन के लिए जिम्मेदार होते हैं। अत: तनाव को समझते समय मात्र शारीरिक अस्तित्व के स्थान पर व्यक्ति की समग्रता की अवधारणा को ध्यान में रखना चाहिए। तैत्तिरीय उपनिषद्‌ में व्यक्ति की समग्रता की अवधारणा को सुव्यवस्थित ढंग से पाँच प्रमुख आवरण अथवा पंचकोश के रूप में बताया गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अन्तर्गत तनाव को शरीर के तंत्रिका-अंत:दाावी तंत्र में असन्तुलन के रूप में जाना एवं समझा जाता है। अति पसन्द और नापसन्द से सम्बद्ध भावात्मक असंतुलन प्राणमय कोश में स्थित प्राण ( जैविक ऊर्जा ) में असन्तुलन का कारण होता है‚ जो अन्ततोगत्वा अन्नमय कोश में तनाव एवं बीमारियों में परिवर्तित होता है। उचित और अनुचित का विचार किए बिना इच्छाओं की उत्पत्ति एवं तद्‌नुरूप कार्य मनोमय कोश के असन्तुलन के रूप में प्रदर्शित होते हैं। विज्ञानमय कोश में अविद्या का क्रमिक ह्रास होता है और आनन्दमय कोश में जाकर यह आनन्द के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यह स्थिति पूर्णरूपेण तनाव मुक्त की स्थिति होती है। जीवन के सभी असन्तुलन को दूर कर प्रसन्नता एवं आनन्द प्राप्त करने हेतु योग एक वरदान है। 95. किस कोश में अविद्या का क्रमश ह्रास होता है?

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निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इससे सम्बन्धित छ: प्रश्नों के उत्तर दीजिए : आधुनिकीकरण के इस युग में अत्यधिक गति और आवश्यकतामूलक परिस्थितियों के कारण असन्तुलन एवं तनाव उत्पन्न होता है जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होती है। अति पसन्द और नापसन्द के कारण भावात्मक स्तर पर असन्तुलन के कारण आवेग प्रकट होते हैं। मनोवैज्ञानिक स्तर पर होने वाले असन्तुलन द्वन्द्व को जन्म देते हैं और बहुत बार संकीर्ण अहं-केन्द्रित व्यवहार के रूप में प्रदर्शित होते है। सूक्ष्म स्तर पर असन्तुतिल दृष्टिकोण और समग्र ज्ञान का अभाव स्थूल स्तर पर असन्तुलन के लिए जिम्मेदार होते हैं। अत: तनाव को समझते समय मात्र शारीरिक अस्तित्व के स्थान पर व्यक्ति की समग्रता की अवधारणा को ध्यान में रखना चाहिए। तैत्तिरीय उपनिषद्‌ में व्यक्ति की समग्रता की अवधारणा को सुव्यवस्थित ढंग से पाँच प्रमुख आवरण अथवा पंचकोश के रूप में बताया गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अन्तर्गत तनाव को शरीर के तंत्रिका-अंत:दाावी तंत्र में असन्तुलन के रूप में जाना एवं समझा जाता है। अति पसन्द और नापसन्द से सम्बद्ध भावात्मक असंतुलन प्राणमय कोश में स्थित प्राण ( जैविक ऊर्जा ) में असन्तुलन का कारण होता है‚ जो अन्ततोगत्वा अन्नमय कोश में तनाव एवं बीमारियों में परिवर्तित होता है। उचित और अनुचित का विचार किए बिना इच्छाओं की उत्पत्ति एवं तद्‌नुरूप कार्य मनोमय कोश के असन्तुलन के रूप में प्रदर्शित होते हैं। विज्ञानमय कोश में अविद्या का क्रमिक ह्रास होता है और आनन्दमय कोश में जाकर यह आनन्द के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यह स्थिति पूर्णरूपेण तनाव मुक्त की स्थिति होती है। जीवन के सभी असन्तुलन को दूर कर प्रसन्नता एवं आनन्द प्राप्त करने हेतु योग एक वरदान है।<br /> 95. किस कोश में अविद्या का क्रमश ह्रास होता है?