निर्देश (46-50) : निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़िए और उसके आधार पर दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए। नव-सहस्त्राब्दी की पहली शताब्दी में विश्व पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक स्थान पर है। लघु युद्ध‚ अलगाववादी आंदोलनों‚ बगावतों और क्षेत्रीय विवादों ने अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों और व्यवस्थाहीन देशों को मूलभूत स्तर पर जगह-जगह पर दाग लगा दिए हैं‚ वो अब आतंकवाद के अकल्पनीय भयानक कृत्यों के सर्वोच्च स्तर पर हैं। यह स्थिति ऐसी ही है जैसे कि यात्रियों से भरे हवाई जहाज को गगनचुम्बी इमारतों से टकराने के लिए निर्दिष्ट मिसाइलों में बदल देना। शीत युद्ध के बाद की उत्तराधिकारी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था‚ जो अब उभर रही है‚ अस्थिर स्थितियों और अंतर्काट राष्ट्रीय हितों द्वारा चरित्रांकित है‚ जिसमें भविष्य के बारे में अनिश्चितता सदुद्‌देश्य मित्रों द्वारा उतना ही आग में ईंधन देती है जितना कि जानकार विरोधियों द्वारा। राष्ट्र राज्यों की व्यवस्था‚ जो शान्ति और भाईचारे के लिए सहस्त्राब्दीय उत्कंठा के अनुरूप होने के कोई चिन्ह नहीं दर्शाती है‚ और संघर्षों को सौहार्द से निबटाने में संयुक्त राष्ट्र के अक्षम सिद्ध होने से‚ बड़े देश अपनी खुद की रक्षा के लिए पृथक बन्दोबस्त करने के लिए छीना-झपटी कर रहे हैं। सुरक्षा के वैश्वीकरण की बात चल रही है। परन्तु उस सबका अर्थ युक्तिकरण और पाम्परिक सामाजिक नीति पर आधारित है‚ क्योंकि राज्यों के पास ज्यादा शक्ति है परन्तु नियंत्रण कम है तो विवेक बढ़ेगा। विश्व में सर्वाधिक शक्तिशाली आर्थिक एवं सैन्य सत्ता के रूप में युनाइटेड ऑफ अमेरिका ने साम्राज्यिक उत्कंठाओं को दिखाना शुरू कर दिया है। वास्तविक समस्या है कि यह विश्वास दिलाने लगता है कि पूर्ण सुरक्षा का पीछा करना कहीं ज्यादा कपोल कल्पित अनुष्ठान है‚ चाहे इसका अर्थ अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से पीछे हटना और प्रव्यक्त असमान शत्रुओं के विरुद्ध उन्नत नाभिकीय एवं पारम्परिक सैन्य शस्त्रों के उपयोग का विचार करना है। यह बात कि नाभिकीय सीमा की दहलीज इसलिए निम्न कर दी है यह वाशिंगटन को परेशान करती नहीं लगती है। पूर्व अनुमानता:‚ इससे‚ अन्यों में तुलनात्मक असुरक्षा की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। संकीर्ण राष्ट्रीय स्वहित‚ जो मूल प्रयोजन तर्क द्वारा न्यायोचित ठहराए गए‚ के प्रयास में निरंकुश एवं एक पक्षीय क्रियाएँ अन्य देशों को नाभिकीय शस्त्र उपयोग‚ या असमान सन्दर्भ में‚ अन्य साधनों को अपनाने और भावी सार्वभौमिक अधिपति पर विचार करने या तोलने के बाधाहीन प्रयत्नों की ओर अग्रसर करती है। भारत-रूस/चीन मैत्री-बन्धन जैसे विचार बिना अधिक विश्वास के प्रस्ताविक किए जा रहे हैं। यूरोपीय राज्य आशंकित हैं कि कहीं वे अमेरिका के मात्र‚ पिछलग्गू न बन जाएँ‚ भारत जैसे देशों के साथ‚ सुरक्षा के क्षेत्र में‚ वैश्विक एवं व्यापक सहयोग फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह वो इस आशा में कर रहे हैं कि ऐसे शक्तिशाली सैन्य समूहन (जैसे‚ उदाहरणों के लिए‚ रूस‚ फ्रांस‚ चीन व भारत) अपने प्रभाव का विस्तार करेंगे और बाध्यकारी उपायों के लिए अमेरिकी उत्साह‚ दुःसाहसीपन और शक्ति के उपयोग की तैयारी को नियंत्रित करेंगे‚ और शान्तिपूर्ण ढंग से‚ अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अमेरिका के प्रभाव की बराबरी करेगें। इसी तरह की सोच‚ रक्षा के क्षेत्र में भारत को बढ़ाने के लिए अभिप्रेरित कर रही है। यह करने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन यह है कि सैन्यशक्ति से शक्तिशाली एवं आत्मविश्वासी भारत दक्षिण में एशिया में चीन के प्रभाव को कम करेगा और तेल व अन्य प्राकृतिक संसाधन-समृद्ध परंतु जनसंख्या की दृष्टि से खाली रूस के साइबेरिया पर चीनी दबाव कम करेगा।Q46. लेखक का मुख्य सरोकार किससे है?

🎲 Try a Random Question  |  Total Questions in Quiz: 1042  |  🧠 Study this quiz with Flashcards
This question is part of a full practice quiz:
UGC NTA NET Political Science Previous Question Papers in Hindi (Rajniti Shastra) — practice the complete quiz, review flashcards, or try a random question.

1000+ previosuly asked राजनीति विज्ञान questions.


निर्देश (46-50) : निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़िए और उसके आधार पर दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए। नव-सहस्त्राब्दी की पहली शताब्दी में विश्व पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक स्थान पर है। लघु युद्ध‚ अलगाववादी आंदोलनों‚ बगावतों और क्षेत्रीय विवादों ने अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों और व्यवस्थाहीन देशों को मूलभूत स्तर पर जगह-जगह पर दाग लगा दिए हैं‚ वो अब आतंकवाद के अकल्पनीय भयानक कृत्यों के सर्वोच्च स्तर पर हैं। यह स्थिति ऐसी ही है जैसे कि यात्रियों से भरे हवाई जहाज को गगनचुम्बी इमारतों से टकराने के लिए निर्दिष्ट मिसाइलों में बदल देना। शीत युद्ध के बाद की उत्तराधिकारी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था‚ जो अब उभर रही है‚ अस्थिर स्थितियों और अंतर्काट राष्ट्रीय हितों द्वारा चरित्रांकित है‚ जिसमें भविष्य के बारे में अनिश्चितता सदुद्‌देश्य मित्रों द्वारा उतना ही आग में ईंधन देती है जितना कि जानकार विरोधियों द्वारा। राष्ट्र राज्यों की व्यवस्था‚ जो शान्ति और भाईचारे के लिए सहस्त्राब्दीय उत्कंठा के अनुरूप होने के कोई चिन्ह नहीं दर्शाती है‚ और संघर्षों को सौहार्द से निबटाने में संयुक्त राष्ट्र के अक्षम सिद्ध होने से‚ बड़े देश अपनी खुद की रक्षा के लिए पृथक बन्दोबस्त करने के लिए छीना-झपटी कर रहे हैं। सुरक्षा के वैश्वीकरण की बात चल रही है। परन्तु उस सबका अर्थ युक्तिकरण और पाम्परिक सामाजिक नीति पर आधारित है‚ क्योंकि राज्यों के पास ज्यादा शक्ति है परन्तु नियंत्रण कम है तो विवेक बढ़ेगा। विश्व में सर्वाधिक शक्तिशाली आर्थिक एवं सैन्य सत्ता के रूप में युनाइटेड ऑफ अमेरिका ने साम्राज्यिक उत्कंठाओं को दिखाना शुरू कर दिया है। वास्तविक समस्या है कि यह विश्वास दिलाने लगता है कि पूर्ण सुरक्षा का पीछा करना कहीं ज्यादा कपोल कल्पित अनुष्ठान है‚ चाहे इसका अर्थ अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से पीछे हटना और प्रव्यक्त असमान शत्रुओं के विरुद्ध उन्नत नाभिकीय एवं पारम्परिक सैन्य शस्त्रों के उपयोग का विचार करना है। यह बात कि नाभिकीय सीमा की दहलीज इसलिए निम्न कर दी है यह वाशिंगटन को परेशान करती नहीं लगती है। पूर्व अनुमानता:‚ इससे‚ अन्यों में तुलनात्मक असुरक्षा की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। संकीर्ण राष्ट्रीय स्वहित‚ जो मूल प्रयोजन तर्क द्वारा न्यायोचित ठहराए गए‚ के प्रयास में निरंकुश एवं एक पक्षीय क्रियाएँ अन्य देशों को नाभिकीय शस्त्र उपयोग‚ या असमान सन्दर्भ में‚ अन्य साधनों को अपनाने और भावी सार्वभौमिक अधिपति पर विचार करने या तोलने के बाधाहीन प्रयत्नों की ओर अग्रसर करती है। भारत-रूस/चीन मैत्री-बन्धन जैसे विचार बिना अधिक विश्वास के प्रस्ताविक किए जा रहे हैं। यूरोपीय राज्य आशंकित हैं कि कहीं वे अमेरिका के मात्र‚ पिछलग्गू न बन जाएँ‚ भारत जैसे देशों के साथ‚ सुरक्षा के क्षेत्र में‚ वैश्विक एवं व्यापक सहयोग फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह वो इस आशा में कर रहे हैं कि ऐसे शक्तिशाली सैन्य समूहन (जैसे‚ उदाहरणों के लिए‚ रूस‚ फ्रांस‚ चीन व भारत) अपने प्रभाव का विस्तार करेंगे और बाध्यकारी उपायों के लिए अमेरिकी उत्साह‚ दुःसाहसीपन और शक्ति के उपयोग की तैयारी को नियंत्रित करेंगे‚ और शान्तिपूर्ण ढंग से‚ अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में अमेरिका के प्रभाव की बराबरी करेगें। इसी तरह की सोच‚ रक्षा के क्षेत्र में भारत को बढ़ाने के लिए अभिप्रेरित कर रही है। यह करने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन यह है कि सैन्यशक्ति से शक्तिशाली एवं आत्मविश्वासी भारत दक्षिण में एशिया में चीन के प्रभाव को कम करेगा और तेल व अन्य प्राकृतिक संसाधन-समृद्ध परंतु जनसंख्या की दृष्टि से खाली रूस के साइबेरिया पर चीनी दबाव कम करेगा।<br />Q46. लेखक का मुख्य सरोकार किससे है?