निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िये तथा प्रश्न संख्या 1 से 4 के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए। मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं। एक समस्या शरीर की है‚ जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएँ मानी जा सकती हैं। किन्तु‚ सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दु:ख‚ दौर्मनस्य‚ रोग‚ शोक‚ जरा और मरण का शिकार होता है। इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र‚ न मोटर और महल हो सकते हैं। प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था। इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा नहीं जा सकता‚ डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता‚ वह या तो सत्य ही नहीं है‚ अथवा है तो ऐसा है‚ जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए। और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया‚ त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गये‚ यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे‚ जहाँ तक संभव हो विज्ञान की भाषा में रखें। किंतु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाश्वत समस्यायें दूर नहीं हुई। वह आज भी दु:खी है। वह आज भी रोग‚ शोक‚ जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे‚ उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल‚ विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में‚ शायद ही कोई‚ रहा हो। अतएव‚ चितंकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है‚ क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाये‚ आंतरिक संतोष में वृद्धि नहीं होती‚ उलटे‚ दिनों दिन उसकी मात्रा घटती जाती है।1. विज्ञान का सत्य किस पर आधारित है?

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Uttar Pradesh UPPSC Previous Papers - CSAT Paper 2 2014 — practice the complete quiz, review flashcards, or try a random question.


निम्नलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िये तथा प्रश्न संख्या 1 से 4 के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर ही दीजिए। मनुष्य की समस्याएं दो प्रकार की हैं। एक समस्या शरीर की है‚ जिसका समाधान रोटी और वस्त्र तथा अन्य आधिभौतिक सुविधाएँ मानी जा सकती हैं। किन्तु‚ सब प्रकार से सुखी मनुष्य भी दु:ख‚ दौर्मनस्य‚ रोग‚ शोक‚ जरा और मरण का शिकार होता है। इस समस्या का समाधान न तो रोटी और वस्त्र‚ न मोटर और महल हो सकते हैं। प्राचीन और मध्यकालीन विश्व शारीरिक समस्याओं से अधिक अपनी आध्यात्मिक समस्याओं को प्रमुख मानता था। इसी से उस समय अध्यात्म-विद्या का सभी देशों में विकास हुआ और मनुष्य मानने लगा कि जो सत्य प्रयोगशाला में परखा नहीं जा सकता‚ डॉक्टर के स्टैथेस्कोप और सर्जन की छुरी से छुआ नहीं जा सकता‚ वह या तो सत्य ही नहीं है‚ अथवा है तो ऐसा है‚ जिसकी ओर मनुष्य को ध्यान नहीं देना चाहिए। और विज्ञान ज्यों-ज्यों नई विजय प्राप्त करता गया‚ त्यों-त्यों अधिकाधिक मनुष्य उसके भक्त बनते गये‚ यहाँ तक कि अध्यात्मवादियों को भी आवश्यकता अनुभूत होने लगी कि अपनी बातों को वे‚ जहाँ तक संभव हो विज्ञान की भाषा में रखें। किंतु विज्ञान की वृद्धि से भी मनुष्य की शाश्वत समस्यायें दूर नहीं हुई। वह आज भी दु:खी है। वह आज भी रोग‚ शोक‚ जरा और मरण का शिकार होता है तथा सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले जिन सुखों की लोग कल्पना भी नहीं कर सकते थे‚ उन सुखों के शैल पर बैठा हुआ मनुष्य भी चंचल‚ विषण्ण और अशांत है तथा उतना अशांत है जितना पहले के युग में‚ शायद ही कोई‚ रहा हो। अतएव‚ चितंकों पर यह प्रतिक्रिया हुई कि मनुष्य की समस्याओं का समाधान विज्ञान भी नहीं है‚ क्योंकि विज्ञान से शरीर चाहे जितना सुखी हो जाये‚ आंतरिक संतोष में वृद्धि नहीं होती‚ उलटे‚ दिनों दिन उसकी मात्रा घटती जाती है।<br />1. विज्ञान का सत्य किस पर आधारित है?






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