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▸ बिहार की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। वर्ष 2000 में खनिज समृद्ध क्षेत्र झारखण्ड का बिहार से पृथक् राज्य के रूप में गठन के बाद बिहार में कृषि का महत्त्व और अधिक बढ़ गया।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार‚ राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 20% है।▸ बिहार में लगभग 1.61 करोड़ जोते हैं‚ जिनका औसत आकार 0.4 हेक्टेयर है।▸ बिहार सम्पूर्ण भारत का 6.6% खाद्यान्न उत्पादन करता है। बिहार में 60% से कम भू-भाग पर कृषि की जाती है।▸ बिहार में बहुमूल्य कृषि (क्षेत्र) (70% से अधिक भू-भाग पर कृषि) वाले जिलों की संख्या 7 है। ये जिले−बक्सर (86.7%), शेखपुरा (77.1%), नालंदा (77.0%), भोजपुर (74.5%), सिवान (73.0), मुजफ्फरपुर (72.0%) तथा गोपालगंज (71.2%) हैं।▸ बिहार में 10 सबसे कम निवल बुआई वाले जिले (50% से कम भूमि पर कृषि)—पटना (49.9%), नवादा (47.2%), अररिया लखीसराय (32.4%), मुंगेर (28.5%) तथा जमुई (15.5%) हैं।▸ प्रदेश में भूमि सुधार वर्ष 1950 में‚ भू-दान अधिनियम 1954 में‚ बिहार राज्य चकबन्दी अधिनियम 1956 और हदबन्दी कानून वर्ष 1961 में पारित किया गया।▸ राज्य में काश्तकारी सुधार वर्ष 1963 में शुरू किया गया‚ किन्तु अधिकतर बटाईदार भूमि की 50% से अधिक फसल भू-स्वामी को देने के लिए मजबूर है‚ जबकि वैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत यह 25% है।▸ उत्तर बिहार के मैदान में वर्षा अधिक होने तथा गंगा‚ गण्डक व कोसी जैसी नदियों के द्वारा जलोढ़ मैदान के निर्माण के कारण अन्य राज्यों की तुलना में यहाँ कृषि भूमि क्षेत्र अधिक है। यह क्षेत्र कृषि समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है।▸ दक्षिण बिहार के सीमान्त पठारी क्षेत्रों में पहाड़ी व ऊबड़−खाबड़ भूमि होने के कारण यहाँ कृषि विस्तार कम हुआ है।▸ दक्षिण−पश्चिम बिहार में सोन नहर सिंचाई
भूमि उपयोग क्षेत्रफल (हजार हेक्टेयर में) प्रतिशतभौगोलिक क्षेत्रफल 9359.57 100 वन 621.64 6.64 बंजर एवं अकृष्य भूमि 431.72 4.61 कृषि भिन्न उपयोग वाली भूमि 1718.59 18.36 कृष्य ऊसर भूमि 44.28 0.45 स्थायी चरागाह 15.08 0.2 बागानी भूमि 248.15 2.6 परती भूमि (वर्तमान परती को छोड़कर) 118.92 1.3 निवल बुआई क्षेत्रफल 5241.97 56.0 सकल बुआई क्षेत्रफल 7525.18 –फसल सघनता 1.45 –
मौसम सम्बन्धी विशेषता; जैसे उच्चावच‚ जलवायु व वर्षा के आधार पर बिहार की कृषि को तीन कृषि जलवायु क्षेत्रों में बाँटा गया है
▸ यह क्षेत्र राज्य के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के अन्तर्गत हिमालय के तराई से आरम्भ होकर गंगा के समतल मैदान तक पहँुचता है।▸ यह राज्य का सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र है। यहाँ चावल एवं गन्ने का उत्पादन अधिक किया जाता है। इसके पश्चिम में उत्तर प्रदेश की सीमा है।▸ इस क्षेत्र में मुख्यत: बलुई दोमट‚ खादर और जलोढ़ मृदा पाई जाती हैं।▸ यहाँ औसत वर्षा 1040-1450 मिमी होती है।▸ इस क्षेत्र की लगभग 42% भूमि सिंचित है।▸ इस जोन में जलवायु क्षेत्र सारण‚ सिवान‚ बेगूसराय‚ समस्तीपुर‚ मुजफ्फरपुर‚ दरभंगा‚ वैशाली‚ सीतामढ़ी‚ शिवहर‚ मधुबनी‚ गोपालगंज‚ पूर्वी एवं पश्चिमी चम्पारण हैं।
▸ यह क्षेत्र उत्तर−पूर्वी मैदान में है। यहाँ मुख्य रूप से मिट्टी दोमट तथा चिकनी दोमट है।▸ यहाँ औसत वर्षा 1200-1700 मिमी होती है। इस क्षेत्र की जलवायु शुष्क उष्णद्रि है।▸ इस जोन में जलवायु क्षेत्र सुपौल‚ सहरसा‚ खगड़िया‚ मधेपुरा‚ पूर्णिया‚ कटिहार‚ किशनगंज एवं अररिया हैं।▸ इस क्षेत्र की लगभग 44% भूमि सिंचित है।
▸ यह क्षेत्र राज्य के दक्षिणी मैदान में है।▸ यहाँ वार्षिक वर्षा 990-1300 मिमी होती है।▸ इस क्षेत्र को दो भागों दक्षिण-पूर्वी जलोढ़ मैदान तथा दक्षिण-पश्चिमी जलोढ़ मैदान में बाटाँ गया है।▸ यहाँ बलुई‚ बलुई-दोमट‚ चिकनी-दोमट और चिकनी मिट्टी पाई जाती है।▸ इस जोन में शेखपुरा‚ लखीसराय‚ जमुई‚ मुंगेर‚ भागलपुर‚ कैमूर‚ रोहतास‚ औरंगाबाद‚ बक्सर‚ भोजपुर‚ जहानाबाद‚ गया‚ नालन्दा‚ पटना‚ नवादा‚ बाँका व अरवल जिले शामिल हैं।▸ इस क्षेत्र में सिंचाई सुविधा का सबसे अधिक विकास हुआ है।▸ इस क्षेत्र की लगभग 75% भूमि सिंचित है।
बिहार में कृषि वैज्ञानिकों ने फसलों की विविधता के आधार पर राज्य को चार कृषि प्रदेशों में विभाजित किया है। इनका विवरण इस प्रकार है▸ एक फसली प्रदेश ये ऐसे क्षेत्र हैं‚ जहाँ केवल एक फसल धान का ही उत्पादन किया जाता है। राज्य में मधुबनी जिला इस श्रेणी के अन्तर्गत आता है। इस जिले में धान की खेती काफी मात्रा में की जाती है।▸ दो फसली प्रदेश ये ऐसे क्षेत्र हैं‚ जहाँ दो फसलें उगाई जाती हैं। इस क्षेत्र में फसलों को धान-मक्का‚ धान-गेहूँ‚ धान-जूट आदि के समूह में उगाया जाता है। राज्य के पूर्णिया जिले को इस श्रेणी के अन्तर्गत रखा गया है।▸ तीन फसली प्रदेश ये ऐसे क्षेत्र हैं‚ जहाँ तीन फसलें मुख्य रूप से उगाई जाती हैं। इन प्रदेशों में धान के साथ जूट‚ खेसारी और गेहूँ में से कोई दो फसलें उगाई जाती हैं।▸ चार फसली प्रदेश ये ऐसे क्षेत्र हैं‚ जहाँ चार फसलों का उत्पादन मुख्य रूप से किया जाता है। राज्य के भागलपुर जिले के सभी क्षेत्रों में धान प्रमुख है और इसके साथ गेहूँ‚ मक्का व खेसारी का उत्पादन किया जाता है।
राज्य में मुख्यत: तीन मौसम की फसलें बोई जाती हैं‚ जिनका विवरण इस प्रकार है
▸ खरीफ फसल मुख्यत: उत्तर बिहार के मैदानी जिलों की विशेषता है। इन जिलों में पूर्णिया‚ सहरसा‚ मधेपुरा‚ सुपौल‚ किशनगंज‚ कटिहार आदि प्रमुख हैं। मुजफ्फरपुर‚ वैशाली‚ सहरसा‚ समस्तीपुर‚ सीतामढ़ी आदि जिलों में मडुआ की खेती व्यापक पैमाने पर की जाती है। गंगा के दियारा एवं कोसी क्षेत्रों▸ खरीफ फसलों की बुआई जून-जुलाई में होती है और अक्टूबर-नवम्बर तक काट ली जाती है। खरीफ फसलों को सिंचाई की कम आवश्यकता पड़ती है।▸ बिहार में खरीफ फसलों को भदई तथा अगहनी फसलों में बाँटा जाता है— भदई फसल इसके अन्तर्गत शीघ्र तैयार होने वाली फसलें बोई जाती हैं‚ जिनमें मक्का‚ ज्वार‚ धान‚ बाजरा एवं कुछ तिलहन प्रमुख हैं। कुछ वार्षिक फसलें; जैसे—गन्ना एवं जूट भी इसी के अन्तर्गत बोई जाती हैं।— अगहनी फसल इसके अन्तर्गत ऐसी फसलें शामिल की जाती हैं‚ जो मानसून आगमन के बाद वर्षा ऋतु में बोई जाती हैं। इसकी बुआई जुलाई-अगस्त में होती है और नवम्बर-दिसम्बर में काट ली जाती है। अगहनी फसल में धान सर्वप्रमुख है। प्रमुख चावल उत्पादक जिलों में पूर्णिया‚ मधुबनी‚ दरभंगा‚ सीतामढ़ी‚ सहरसा तथा रोहतास आदि हैं।
▸ यह बसन्त ऋतु की फसल है‚ जिसकी बुआई अक्टूबर-नवम्बर में होती है तथा यह फसल मार्च-अप्रैल तक तैयार हो जाती है। इसके अन्तर्गत गेहूँ सबसे मुख्य फसल है। गेहूँ के अतिरिक्त जौ‚ चना‚ मटर‚ सरसों आदि फसलें भी बड़ी मात्रा में बोई जाती हैं।
▸ ये फसलें मार्च से जून के बीच बोई और काटी जाती हैं। राज्य में जहाँ भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है अथवा आर्द्र भूमि वाले क्षेत्र हैं‚ वहाँ जायद फसलों की खेती होती है। जायद फसलों में हरी सब्जियों का विशेष स्थान है।▸ इस ऋतु की फसलों में विशेष किस्म के धान एवं मक्का की कृषि का महत्त्व सिंचित क्षेत्रों में बढ़ने लगा है।
बिहार की प्रमुख फसलें निम्नलिखित हैं
▸ धान बिहार राज्य की प्रमुख फसल है। धान यहाँ का सर्वप्रमुख भोज्य पदार्थ है। इसकी खेती कुल उपलब्ध भूमि के 45% भाग पर की जाती है। बिहार में धान सर्वाधिक क्षेत्र में बोया जाता है।▸ चावल उत्पादन में बिहार का स्थान पश्चिम बंगाल‚ उत्तर प्रदेश‚ आन्ध्र प्रदेश‚ पंजाब और तमिलनाडु के बाद छठा है।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ 2017-18 में बिहार में 8.93.16 हजार टन चावल का उत्पादन हुआ था। बिहार में चावल के अग्रणी उत्पादक जिले रोहतास‚ लखीसराय तथा अरवस हैं; लेकिन प्रति हेक्टेयर उपज का औसत मुंगेर में सर्वाधिक है।▸ वर्ष 2013 में बिहार को चावल उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार दिया गया था।▸ राज्य में धान की प्रमुख किस्में साकेत‚ प्रभात‚ सीता‚ कनक‚ स्वर्णा सब−1 आदि हैं। उपजकाल के अनुसार बिहार में तीन प्रकार का धान उपजाया जाता है— अगहनी धान बिहार के धान क्षेत्र के 80% से अधिक भाग में विशेष रूप में अगहनी धान उगाया जाता है। यह धान की खेती मुख्यत: प्रत्यारोपित विधि की देन है। यह मुख्यत: गण्डक-कोसी के दोआब क्षेत्र में होती है।— गरमा धान इसके अन्तर्गत बिहार का 3% क्षेत्र आता है। इसके लिए सिंचाई के साधन का होना अति आवश्यक है।— बोरो धान यह फसल बिहार के धान क्षेत्र के 2% से भी कम क्षेत्र पर बोई जाती है। यह फसल बिहार में मुख्यत: पूर्णिया‚ पूर्वी तथा पश्चिमी चम्पारण में होती है। इसके
▸ गेहूँ बिहार की दूसरी प्रमुख फसल है। यह रबी फसल है। इसे नवम्बर-दिसम्बर में बोया जाता है और मार्च-अप्रैल में काटा जाता है।▸ इसका उत्पादन कम वर्षा और शीतोष्ण जलवायु क्षेत्र में किया जाता है। इसके लिए बलुई-दोमट मृदा की आवश्यकता होती है‚ जिसमें नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है।▸ यह फसल कुल कृषित भूमि के लगभग 29% भाग पर बोई जाती है। पटना‚ मधेपुरा तथा समस्तीपुर गेहूँ उत्पादन में अग्रणी जिले हैं। प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में बेगूसराय शीर्ष पर है।▸ गेहूँ का प्रमुख क्षेत्र सिंचित मैदानी भागों तक सीमित है।▸ गेहूँ उत्पादन में बिहार का छठा स्थान है। पिछले दशकों में गेहूँ उत्पादन का मुख्य कारण हरित क्रान्ति के प्रभाव के कारण उच्च कोटि के बीजों का प्रयोग‚ रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग तथा सिंचाई सुविधा का व्यापक व प्रभावी विकास हुआ है।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ 2017-18 में राज्य में 6104.3 हजार टन गेहूँ उत्पादन हुआ था।▸ राज्य में गेहूँ की प्रमुख किस्में C-306, K-9107, HD-2824 आदि हैं।
▸ मक्का‚ धान और गेहूँ के बाद बिहार की तीसरी प्रमुख फसल है। यह मुख्यत: खरीफ फसल है। इसके लिए हल्की एवं चिकनी मृदा उपयुक्त रहती है।▸ इसके अन्तर्गत मुख्यत: बूढ़ी गण्डक के दक्षिण-पश्चिम का क्षेत्र‚ सारण‚ गोपालगंज‚ सिवान‚ वैशाली‚ समस्तीपुर‚ पूर्वी और पश्चिमी चम्पारण‚ सहरसा‚ सुपौल का कोसी▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ 2017-18 में बिहार में 3120.77 हजार टन मक्का उत्पादन हुआ था।▸ वर्ष 2016 में बिहार को मक्का उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार दिया गया था।
▸ जौ रबी की फसल है। जौ की खेती अत्यन्त प्राचीनकाल से ही की जा रही है। जौ की खेती हेतु कम वर्षा तथा उष्ण जलवायु उपयुक्त होती है।▸ पौष्टिकता की दृष्टि से यह गेहूँ से अधिक महत्त्वपूर्ण है।▸ जौ को मिश्रित फसल के रूप में बोया जाता है। जौ उत्पादन में पूर्वी एवं पश्चिमी चम्पारण (जिले) अग्रणी हैं।▸ इसके अतिरिक्त गोपालगंज‚ सिवान‚ वैशाली और मुजफ्फरपुर में भी जौ की खेती होती है। जौ उत्पादन में बिहार देश का 8वाँ बड़ा राज्य है।▸ राज्य में जौ की प्रमुख किस्में K-125, रत्ना‚ ज्योति व आजाद आदि हैं।
▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ 2017-18 में बिहार में कुल 454.17 हजार टन दलहन उत्पादन हुआ था। प्रमुख दलहनी फसलें निम्नलिखित हैं
▸ बिहार की दलहन फसलों में चने का मुख्य स्थान है। इसका उपयोग दाल के अतिरिक्त अन्य कई रूपों में किया जाता है।▸ चना बिहार में गेहूँ के बाद दूसरी प्रमुख रबी फसल है। चना उत्पादन के लिए केवाल और जलोढ़ मृदा सर्वाधिक उपयुक्त हैं।▸ चने की खेती मुख्यत: रोहतास‚ कैमूर‚ भोजपुर‚ नालन्दा‚ मुंगेर‚ भागलपुर‚ पटना▸ राज्य में चने की प्रमुख किस्में पूसा-256, राजेन्द्र चना‚ BR-72 आदि हैं।
▸ अरहर एक प्रमुख दलहन फसल है। इसे खरीफ फसल के साथ बोया जाता है तथा रबी फसल के साथ काटा जाता है। इसकी खेती के लिए सिंचाई और उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है।▸ बिहार में इसकी खेती लगभग 83,000 हेक्टेयर भूमि पर की जाती है।▸ यह बिहार के लगभग सभी जिलों में बोई जाती है‚ परन्तु इसकी खेती मुख्यत: गोपालगंज‚ दरभंगा‚ पूर्वी चम्पारण‚ मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी में होती है।
▸ खेसारी एक निम्नकोटि का दलहन है। यह उत्पादक क्षेत्र की दृष्टि से बिहार की प्रमुख दलहन फसल है।▸ इसके प्रमुख उत्पादक क्षेत्र गंगा का दियारा क्षेत्र‚ टाल क्षेत्र‚ जल्ला क्षेत्र तथा कोसी नदी बेसिन हैं।
▸ मूँग की खेती मैदानी बिहार की प्रमुख विशेषता है। इसे गेहूँ काटने के बाद बोया जाता है और धान की बुआई से पहले काट लिया जाता है। मुंगेर‚ शेखपुरा‚ भागलपुर‚ सहरसा‚ सुपौल‚ पूर्णिया इसके प्रमुख उत्पादक जिले हैं।
▸ मोटे अनाजों में यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह एक भदई फसल है। इसके लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है।▸ रागी की खेती कम उपजाऊ बलुई मृदा में की जाती है। मडुआ या रागी काटकर धान रोपा जा सकता है।▸ इसकी खेती कोसी के बाढ़ प्रभावित जिलों सहरसा‚ सुपौल‚ मधेपुरा‚ दरभंगा‚ समस्तीपुर और वैशाली में होती है। इसके अतिरिक्त
▸ मसूर बिहार की प्रमुख दलहन फसल है। इसकी खेती रबी के मौसम में की जाती है। मसूर का सर्वाधिक उत्पादन पटना जिले में होता है। इसके अन्य प्रमुख उत्पादक जिलों में नालन्दा‚ गया‚ जहानाबाद‚ मुंगेर‚ औरंगाबाद आदि शामिल हैं।▸ अन्य दलहन फसलों में उड़द‚ कुलथी प्रमुख हैं। प्रमुख रूप से इनकी खेती भागलपुर और कटिहार जिलों में की जाती है।
फसल उत्पादन/ उत्पादकता वर्ष 2017-18विकसित जिले अल्पविकसित जिलेचावल विकसित जिले रोहतास‚ औरंगाबाद‚ कैमूर भोजपुर‚ रोहतास‚ अरवल अल्यपविकसित जिले बेगूसराय‚ खगड़िया‚ शिवहर मधुबनी‚ पूर्वी चम्पारण‚ मुजफ्फरपुर गेहूँ विकसित जिले रोहतास‚ पूर्वी चम्पारण‚ बक्सर पटना‚ समस्तीपुर‚ मधेपुरा अल्यपविकसित जिले मुगेंर‚ किशनगंज‚ अरवल पश्चिमी चम्पारण‚ मधुबनी‚ किशनगंज मक्का विकसित जिले कटिहार‚समस्तीपुर‚ खगड़िया कटिहार‚ पूर्णिया‚ समस्तीपुर अल्यपविकसित जिल औरंगाबाद‚ कैमूर‚ रोहतास लखीसराय‚ मुजफ्फरपुर‚ शेखपुरा दलहन विकसित जिले पटना‚ औरंगाबाद‚ नालन्दा सारण‚ वैशाली‚ पटना अल्यपविकसित जिल मुंगेर‚ शिवहर‚ गोपालगंज समस्तीपुर‚ सुपौल‚ पूर्णिया
▸ बिहार में तिलहन खाद्य फसलें होते हुए भी व्यापारिक महत्त्व की फसल हैं। इसके अन्तर्गत तीसी‚ राई व सरसों‚ तिल और रेण्डी आदि फसलें आती हैं। इसके अतिरिक्त रेण्डी (अरण्डी) भी तिलहन समुदाय की अखाद्य फसल है‚ जो व्यापारिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण है। प्रमुख तिलहन फसलें निम्नलिखित हैं
▸ तीसी अर्थात् अलसी गहरी‚ नमीयुक्त भारी चिकनी मृदा में उत्पादित होती है। बिहार में तीसी का उत्पादन‚ पटना‚ तिरहुत और भागलपुर मण्डलों में होता है।▸ तीसी के सर्वाधिक उत्पादक जिलों में सारण तथा गया हैं। तीसी का सर्वाधिक प्रति हेक्टेयर उत्पादन दरभंगा जिले में होता है।
▸ बिहार में उत्पादित की जाने वाली तिलहनी फसलों में राई और सरसों का स्थान प्रमुख है। राज्य में भोजन बनाने में इसके तेल का प्रयोग सर्वाधिक किया जाता है।▸ यह फसल राज्य के लगभग सभी जिलों में थोड़ी-बहुत मात्रा में उगाई जाती है‚ लेकिन मैदानी भाग में इसकी खेती विस्तृत रूप से की जाती है। तिरहुत‚ पटना प्रमण्डल के क्षेत्र में सरसों बोई जाती है। प्रति हेक्टेयर उत्पादन की दृष्टि से
▸ तिलहन के अन्तर्गत तिल एक प्रमुख फसल है। इसका प्रयोग खाद्य-पदार्थ के अतिरिक्त सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री में होता है।▸ बिहार में काला व सफेद दोनों ही प्रकार का तिल उगाया जाता है। राज्य में तिल का सर्वाधिक उत्पादन करने वाला जिला सुपौल है। बिहार में गया‚ पूर्वी चम्पारण और बक्सर जिलों में तिल उत्पादन किया जाता है।
▸ रेण्डी अथवा अरण्डी का उत्पादन बिहार में उचित मात्रा में किया जाता है। रेण्डी का प्रयोग जलाने‚ साबुन उद्योग व चिकनाहट के लिए होता है। बिहार में अरण्डी का उत्पादन सामान्य रूप से सभी जिलों में होता है। खेतों के किनारे रेण्डी के पौधे लगा दिए जाते हैं। इसकी खेती कम उपजाऊ वाली भूमि व ऊँची-नीची भूमि में भी हो जाती है।▸ बिहार में भागलपुर‚ मुंगेर‚ पटना‚ दरभंगा‚ मुजफ्फरपुर‚ पूर्णिया और सारण जिलों में इसकी खेती विस्तृत पैमाने पर की जाती है।
▸ व्यापारिक दृष्टि से उत्पादित की जाने वाली फसलें व्यावसायिक या नकदी फसलों के अन्तर्गत शामिल की जाती हैं। बिहार में गन्ना‚ तम्बाकू‚ आलू‚ जूट इत्यादि प्रमुख नकदी फसलें उत्पादित की जाती हैं।
▸ बिहार‚ देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में से एक है। गन्ना यहाँ की प्रमुख व्यावसायिक फसल है। गन्ने का प्रयोग चीनी उद्योग में किया जाता है। भारत में गन्ने का सर्वाधिक उत्पादन बिहार एवं उत्तर प्रदेश में होता है।▸ गन्ने की खेती उत्तरी बिहार के बाढ़मुक्त क्षेत्र में होती है। इस क्षेत्र की चूनायुक्त जलोढ़ मृदा गन्ने की खेती का प्रमुख आधार है। कोसी के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में गन्ने की खेती▸ भारत में गन्ने की बुआई खरीफ की फसलों के समय की जाती है।▸ बिहार में गन्ना उत्पादन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त क्षेत्र बागमती नदी के उत्तरी-पूर्वी भाग में अवस्थित है।▸ गन्ना उत्पादक जिलों में प्रमुख जिलें पटना‚ मधेपुर‚ सीतामढ़ी‚ पश्चिमी चम्पारण‚ पूर्वी चम्पारण‚ गोपालगंज‚ सिवान तथा सारण‚ वैशाली‚ समस्तीपुर‚ कैमूर‚ रोहतास‚ गया एवं नवादा हैं।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ 2017-18 में बिहार में गन्ने का कुल उत्पादन 17610.12 हजार टन था।
▸ तम्बाकू उत्पादन में बिहार का आन्ध्र प्रदेश और असम के बाद देश में तीसरा स्थान है। इसकी खेती गण्डक नदी से बिहार की पूर्वी सीमा तक होती है।▸ तम्बाकू उत्पादक प्रमुख जिले वैशाली‚ सीतामढ़ी‚ समस्तीपुर‚ बेगूसराय‚ पूर्णिया आदि हैं। पूर्णिया में विशेष प्रकार का विलायती तम्बाकू उपजाया जाता है।
▸ आलू बिहार की एक प्रमुख व्यावसायिक फसल है। अन्य फसलों की अपेक्षा बिहार में आलू का उत्पादन अधिक किया जाता है।▸ इसकी खेती लगभग सभी जिलों में होती है। आलू का प्रयोग एक प्रमुख सब्जी के रूप में होता है।▸ राज्य में आलू की प्रमुख किस्में कुफरी ज्योति‚ कुफरी सतलज‚ कुफरी बादशाह‚ राजेन्द्र आलू-3 आदि हैं।▸ इसकी उपज मुख्य रूप से दोमट‚ चिकनी-दोमट तथा बलुई मिट्टी में की जाती है। नालन्दा जिला आलू का सर्वप्रमुख उत्पादक
▸ यह भारत का मूल पौधा है। इससे एक प्रकार का रेशा प्राप्त होता है‚ जिसका प्रयोग टाट‚ गलीचे‚ बोरा‚ रस्सी आदि बनाने में होता है। जूट की खेती बिहार के आर्द्र क्षेत्र में होती है।▸ इसकी उपज के लिए उच्च आर्द्रता‚ ऊँचा तापमान‚ उपजाऊ जलोढ़ मृदा‚ हल्की वर्षा (112 मिमी) आवश्यक हैं।▸ जूट मुख्यत: प्राकृतिक कगारों पर उपजाया जाता है और इसकी धुलाई के लिए स्वच्छ जल का जलागार आवश्यक है। जूट की खेती मुख्यत: पूर्णिया‚ किशनगंज‚ कटिहार‚ सहरसा‚ मधेपुरा और सुपौल जिलों में होती है।▸ बिहार में पूर्णिया जिले में सर्वाधिक जूट पैदा किया जाता है। इसके अतिरिक्त पश्चिमी चम्पारण‚ पूर्वी चम्पारण‚ मधुबनी और दरभंगा जिलों में भी इसकी खेती होती है।▸ जूट उत्पादन में बिहार का देश में पश्चिम बंगाल के बाद दूसरा स्थान है।
▸ बिहार के किशनगंज जिले में चाय उत्पादन किया जाता है।▸ किशनगंज जिले में 11 बड़े चाय उद्यान और 150 छोटे चाय उद्यान शुरू किए गए हैं।▸ इन सभी चाय बागानों को वाणिज्य एवं उद्योग मन्त्रालय के टी-बोर्ड द्वारा अनुदान भी दिया गया है।
▸ मिर्च या मिरचाई एक अगहनी फसल है‚ लेकिन यह सालभर उपजाई जाती है। इसकी खेती के लिए जलोढ़ मृदा सर्वाधिक उपयुक्त है।▸ इसे मैदानी बिहार के लगभग सभी जिलों में उत्पादित किया जाता है‚ लेकिन समस्तीपुर‚ दरभंगा‚ वैशाली‚ बेगूसराय आदि प्रमुख उत्पादक जिले हैं। इसके अतिरिक्त पश्चिमी चम्पारण और पूर्वी चम्पारण‚ मधुबनी‚
▸ मेस्टा की पैदावार बिहार के मैदानी भागों में होती है। इसके लिए अधिक वर्षा एवं उपजाऊ भूमि की आवश्यकता होती है।▸ पूर्णिया‚ सहरसा‚ पूर्वी चम्पारण‚ पटना‚ मुजफ्फरपुर‚ दरभंगा आदि जिलों में मेस्टा उगाया जाता है।
▸ कृषि जलवायु की अनुरूप स्थितियों के कारण बिहार में विभिन्न प्रकार के फल और सब्जियों का उत्पादन होता है।
▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार बिहार का भारत में सब्जी उत्पादन में प्रथम स्थान है। वर्ष 2017-18 में राज्य में सब्जी का कुल उत्पादन 148.12 लाख टन था।▸ राज्य में आलू‚ टमाटर‚ प्याज‚ गोभी आदि सब्जियों का उत्पादन किया जाता है।▸ राज्य में सर्वाधिक फसल आलू की उगाई जाती है।
▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार‚ बिहार के 2.89 क्षेत्रफल पर कुल 42.29 लाख टन फल उत्पादन हुआ है। बिहार के मुजफ्फरपुर की शाही लीची और मालदह आम अपने स्वाद के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। शाही लीची को वर्ष 2018 में भौगोलिक संकेतक (जीआई) प्रदान किया गया है।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ राज्य में वर्ष 2017-18 में सर्वाधिक उत्पादन केले (15.51 लाख टन) का हुआ था।▸ राज्य में केले के अतिरिक्त आम‚ अमरूद‚ लीची‚ अन्नास‚ पपीता‚ तरबूज‚ आँवला व खरबूजे की फसलें भी उगाई जाती हैं।▸ आम का मुख्य उत्पादक जिला दरभंगा‚ केले और लीची का मुख्य उत्पादक जिला
▸ प्रदेश में किसानों के 270 समूहों का गठन किया गया है और प्रत्येक जिले के दो गाँवों को जैविक गाँव घोषित किया गया है। समस्तीपुर में कोठिया राज्य का पहला जैविक ग्राम है।▸ वर्मी कम्पोस्ट के उत्पादन पर अनुदान उपलब्ध कराने वाला बिहार देश का पहला राज्य है। बेगूसराय को प्रदेश में वर्मी कम्पोस्ट का जनक माना जाता है।▸ 'बिहार ब्राण्ड केंचुए' की माँग पूरे देश में है।
बिहार कृषि निदेशालय‚ कृषि विभाग बिहार सरकार द्वारा कृषि विकास सम्बन्धित अनेक योजनाएँ वर्ष 2016–17 के दौरान प्रारम्भ की गई। प्रमुख योजनाएँ निम्नलिखित हैं▸ मुख्यमन्त्री तीव्र बीज विस्तार योजना इस योजना का मुख्य उद्देश्य राज्य के सभी राजस्व गाँवों में एक साथ उन्नत प्रभेदों के बीज उपलब्ध कराकर बीज उत्पादन हेतु किसानों को प्रोत्साहित करना है। इसके तहत प्रखण्ड स्तर पर किसानों को प्रशिक्षित भी किया जाता है।▸ अनुदानित दर पर बीज वितरण योजना इस योजना के अन्तर्गत उच्च गुणवत्ता वाली नवीनतम बीजों की पहुँच ग्रामीण क्षेत्रों में करने हेतु धान एवं गेहूँ के 10 वर्षों से कम अवधि के प्रभेद के बीज पर अनुदान अनुमान्य किया गया है।▸ एकीकृत बीज ग्राम योजना एकीकृत बीज ग्राम योजना हेतु नालन्दा‚ बक्सर‚ रोहतास‚ कैमूर‚ भोजपुर‚ औरंगाबाद‚ कटिहार एवं पूर्णिया जिलों को चिह्नित किया गया है। इसके तहत किसानों को 60% अनुदान पर दलहन एवं तिलहन के फसलों के आधार प्रमाणित बीज तथा अन्य फसलों के बीज 50% अनुदान पर उपलब्ध कराए जाते हैं।▸ बिहार राज्य बीज निगम सुदृढ़ीकरण योजना राज्य में भण्डारण क्षमता बढ़ाने हेतु निगम द्वारा गोदाम निर्माण बनाने की योजना है। इसका निर्माण भारत निर्माण योजना के अन्तर्गत किया जा रहा है।▸ बिहार राज्य बीज प्रमाणन एजेन्सी को सहायक अनुदान इसके अन्तर्गत वर्ष 2016–17 के दौरान बीज प्रमाणीकरण कार्य करने हेतु ` 448.81 लाख का अनुदान उपलब्ध कराया गया है। इस राशि का उपयोग एजेन्सी में कार्यरत् मानव बल‚ बीज जाँच प्रयोगशाला‚ डी.एन.ए. फिंगर प्रिण्टिंग लैब‚ क्षेत्रीय कार्यालयों सुदृढ़ीकरण पर व्यय किया जाना है।▸ जीरो टिलेज तकनीक से गेहूँ की बुआई चावल उत्पादन के पश्चात् गेहूँ की बुआई जीरो टिलेज तकनीक से करने के लिए किसानों को प्रोत्साहन योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा ` 2960 प्रति एकड़ अनुदान की व्यवस्था की गई है। इससे गेहूँ की बुआई के समय में 20-25 दिनों की बचत हो जाती है।▸ मिट्टी बीज एवं उर्वरक प्रयोगशाला के उन्नयन कार्यक्रम स्थायी एवं गतिमान प्रयोगशाला के माध्यम से मिट्टी‚ बीज एवं उर्वरकों की जाँच करना। इसके अन्तर्गत राज्य सरकार परीक्षण कर्मियों को नियमित रूप से प्रशिक्षण देती है।▸ कृषि यान्त्रिकरण योजना इसके अन्तर्गत 44 विभिन्न प्रकार के कृषि यन्त्रों पर अनुदान की व्यवस्था की गई है। कृषि यन्त्रीकरण योजना में आवेदन प्राप्ति से लेकर यन्त्र वितरण तक की ऑनलाइन व्यवस्था हेतु मैकेनाइजेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जा रहा है।▸ दियारा विकास योजना इस योजना के अन्तर्गत बक्सर‚ भोजपुर‚ पटना‚ सीतामढ़ी‚ मुजफ्फरपुर‚ पूर्वी चम्पारण‚ पश्चिमी चम्पारण‚ खगड़िया‚ सहरसा‚ सुपौल‚ कटिहार‚ मधेपुरा‚ पूर्णिया भागलपुर‚ मुंगेर‚ लखीसराय‚ समस्तीपुर‚ वैशाली‚ दरभंगा‚ मधुबनी‚ बेगूसराय‚ सिवान‚ गोपालगंज‚ शिवहर एवं सारण (25 जिले) जिलों में दियारा विकास योजना संचालित की जा रही है। दियारा विकास योजना के अन्तर्गत सरकार इन क्षेत्रों में विशेष अनुदान देती है। फसलों के नष्ट होने पर मुआवजा प्रदान किया जाता है।▸ धातु कोठिला का अनुदानित दर वितरण कार्यक्रम इसके अन्तर्गत राज्य सरकार द्वारा अन्न भण्डारण हेतु किसानों को अनुदानित दर पर धातु कोठिला वितरित किया जाता है। यह योजना 'अन्न भंडारण योजना केन्द्र' के तहत चलाई जा रही है। छोटे किसानों के लिए धातु कोठिला अत्यन्त उपयोगी है। वर्ष 2018-19 में 5 क्ंिवटल क्षमता के एक धातु कोठिला के लिए प्राक्कलित राशि ` 2225 निर्धारित है।▸ जैविक खेती प्रोत्साहन योजना वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन में वृद्धि हेतु किसानों को 75 घन फीट क्षमता के स्थायी/अर्द्धस्थायी उत्पादन इकाई पर मूल्य का 50% अधिकतम ` 30,000 प्रति इकाई की दर से अनुदान देने का प्रावधान है। एक किसान अधिकतम 05 इकाई हेतु अनुदान का लाभ ले सकता है।▸ बीजोपयार योजना समेकित कीट प्रबन्धन की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किसानों को बीजोपयार रासायन पर मूल्य का 50% अधिकतम ` 150 प्रति हेक्टेयर सहायता दी जाती है।▸ बाजार समिति का जीर्णोद्धार योजना इसके अन्तर्गत 16 कृषि उत्पादन बाजार समितियों का जीर्णोद्धार करने की योजना है।▸ तिलहन एवं मक्का की समेकित योजना केन्द्र सरकार की इस योजना को बिहार राज्य के चयनित क्षेत्रों में तिलहन एवं मक्का के गुणवत्तापूर्ण उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि हेतु वर्ष 1986 में लागू किया गया था।▸ समेकित कीट प्रबन्धन कार्यक्रम यह योजना वर्ष 1988 में केन्द्र सरकार द्वारा प्रारम्भ की गई थी।▸ इसका उद्देश्य पर्यावरण एवं कृषि उत्पादों को कीटनाशकों के दुष्प्रभाव से बचाया जाना है।▸ किसान क्रेडिट कार्ड योजना यह योजना वर्ष 1998-99 में प्रारम्भ की गई थी। इसके अन्तर्गत किसानों को कृषि लागत सामग्रियों के लिए अधिकतम ` 50,000 का ऋण दिया जाता है।▸ राष्ट्रीय कृषि विकास योजना यह योजना वर्ष 2007 में प्रारम्भ की गई थी। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का लक्ष्य कृषि एवं समवर्गी क्षेत्रों का समग्र विकास सुनिश्चित करते हुए 11वीं योजना अवधि के दौरान कृषि क्षेत्र में 4% वार्षिक वृद्धि प्राप्त करना है। यह एक केन्द्र प्रायोजित योजना है।▸ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन शत-प्रतिशत अनुदान पर आधारित केन्द्र प्रायोजित योजना है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजनान्तर्गत बिहार में यह योजना वर्ष 2007-08 से प्रारम्भ की गई है। इस मिशन के अन्तर्गत राज्य के उन्हीं जिलों को अंगीकृत किया गया है‚ जिनमें चावल‚ गेहूँ एवं दलहन की उत्पादकता अधिक है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अन्तर्गत राज्य के 18 जिलों को शामिल किया गया है।▸ बीज ग्राम योजना वर्ष 2010-11 में राज्य के सभी प्रखण्डों के चार-चार गाँवों में धान एवं गेहूँ के बीज उत्पादन की योजना कार्यान्वित की गई थी। इस कार्यक्रम में गाँव के सभी इच्छुक किसानों को आधा एकड़▸ धान की मिनीकोट योजना केन्द्र प्रायोजित योजना के अन्तर्गत मिनीकोट बीज चयनित कृषकों के बीच 80% अनुदान पर उपलब्ध कराया जाता है। इसके अन्तर्गत 5-10 वर्षों के विकसित क्षेत्रों को राज्य के चयनित क्षेत्रों में वितरित किया जाता है।▸ टाल विकास योजना टाल क्षेत्रों में कीट- व्याधियों के समेकित प्रबन्धन एवं पर्यावरण सन्तुलन को ध्यान में रखते हुए फसल का उत्पादन बढ़ाने एवं फसल समस्या समाधान में कृषकों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु कृषक प्रक्षेत्र पाठशाला संचालित किए जा रहे हैं।▸ किसान सलाहकार योजना प्रत्येक पंचायत में पदस्थापित किसान सलाहकारों के मानदेय राज्य योजना से कर्णंकित की गई है।▸ धान का कम्यूनिटी नर्सरी विकास राज्य में इस योजना के अन्तर्गत धान के सामुदायिक नर्सरी एवं बिचड़ा विकास हेतु किसानों के लिए अनुदान की व्यवस्था की गई है।▸ एक एकड़ में नर्सरी उगाने वाले किसानों को ` 6,500 की सहायता प्रदान की जाती है।▸ ई-किसान भव का निर्माण कृषि के समग्र विकास एवं कृषकों के हित में कृषि विभाग द्वारा राज्य के सभी 534 प्रखण्डों में ई-किसान भवन का निर्माण कार्य कराया जा रहा है। कुल 534 प्रखण्डों में से 294 प्रखण्डों में ई-किसान भवन का कार्य पूर्ण हो चुका है। शेष 240 प्रखण्डों में निर्माण का कार्य प्रगति में है।
▸ बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य की अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्त्वपूर्ण स्थान है।▸ राज्य में कुल पशु सम्पदा वर्ष 2019 की गणना के अनुसार 365 लाख है।▸ गाय‚ बैल‚ भैंस‚ घोड़ा‚ खच्चर‚ भेड़‚ मछली‚ गधा और कुक्कुट पशुधन में सम्मिलित हैं।
▸ बिहार में पटना‚ बरौनी एवं मुजफ्फरपुर जिले डेयरी उद्योग के प्रमुख केन्द्र हैं।▸ प्रदेश में पशुओं का प्रयोग मुख्य रूप से पौष्टिक खाद्य-पदार्थों; जैसे—दूध‚ मांस आदि के उत्पादन तथा कृषि कार्यों; जैसे—माल ढुलाई‚ जुताई और सिंचाई में किया जाता है। राज्य के 35% ग्रामीण परिवारों के पास किसी-न-किसी प्रकार का पशुधन है।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ वर्ष में बिहार में लाख टन दुग्ध उत्पादन तथा 2.81 लाख किग्रा ऊन उत्पादन हुआ था।▸ आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार‚ वर्ष 2017-18 में राज्य में गाय से दूध उत्पादन के शीर्ष तीन जिलें समस्तीपुर‚ पटना और बेगूसराय हैं।▸ बकरियों से दूध उत्पादन में अररिया‚ पूर्वी चम्पारण और मुजफ्फरपुर शीर्ष तीन जिले हैं।▸ बिहार सरकार ने पशुपालन को उन्नत बनाने के लिए पशुधन विकास एजेंसी का गठन किया है।
▸ राज्य में अण्डों तथा मांस की प्राप्ति हेतु कुक्कुट पालन किया जाता है। इसके अन्तर्गत मुर्गीपालन और बत्तखपालन सम्मिलित किए जाते हैं।▸ मुर्गी कुक्कुट पालन मुख्यत: किशनगंज‚ कटिहार‚ मुजफ्फरपुर‚ अररिया आदि जिलों में होता है।▸ बिहार में 2,000 से अधिक मुर्गीपालन केन्द्रों की स्थापना की गई है‚ लेकिन महँगी दवा‚ वित्तीय कमी‚ उचित प्रशिक्षण की कमी‚ बिजली की कमी‚ कुक्कुट पालन के विकास में बाधक हैं।▸ बिहार में चार कुक्कुट प्रजनन फार्म पटना‚ मुजफ्फरपुर‚ पूर्णिया और किशनगंज में स्थापित किए गए हैं।
▸ राज्य में सर्वाधिक मछली का उत्पादन दरभंगा‚ मधुबनी एवं समस्तीपुर जिलों में किया जाता है। राज्य में सर्वाधिक मछलियाँ नदियों‚ तालाबों‚ तालों‚ पोखरों इत्यादि में पकड़ी जाती हैं। राज्य की प्रमुख मछलियों में रोहू‚ कतला‚ भाखुर और मांगुर हैं।▸ बिहार सरकार वर्ष 1975 से मछलियों के अण्डों का उत्पादन तथा मत्स्यपालन की फार्मिंग पद्धति को अपनाकर मत्स्यपालन को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है।▸ वर्ष 2017–18 में कुल 6.97 लाख टन मछली उत्पादन हुआ था।▸ वर्ष 2018-19 के अनुसार‚ बिहार में तीन अग्रणी मत्स्य उत्पादक दरभंगा (1750 लाख टन)‚ जिले मधुबनी (1626 लाख टन) और पूर्वी चम्पारण (731 लाख टन) हैं।
▸ पशुपालन क्षेत्र के विकास के लिए राज्य सरकार की पशुओं की चिकित्सा‚ टीकाकरण‚ बधियाकरण‚ कृत्रिम गर्भाधान और चारा बीजों का मुफ्त वितरण जैसी अनेक योजनाएँ हैं।▸ बिहार पशु प्रजनन नीति‚ 2011 के क्षेत्र आधार पर कृत्रिम गर्भाधान का क्रियान्वयन किया जा रहा है।▸ राज्य सरकार की ओर से पशु सम्पदा में वृद्धि के लिए प्रतिवर्ष सोनपुर पशु (विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला) मेले का आयोजन किया जाता है।▸ सरकार की ओर से पशुपालन विभाग ने डेयरी विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत पशु नस्ल सुधार योजना कार्यान्वित की जा रही है‚ जिसमें दुग्ध उत्पादक पशुओं को प्रोत्साहन दिया जाता है।▸ राज्य में पटना‚ मुजफ्फरपुर‚ बरौनी‚ भागलपुर‚ मुंगेर‚ दरभंगा आदि स्थानों पर औद्योगिक स्तर पर डेयरियाँ स्थापित की गई हैं।▸ दुधारू पशुओं की संख्या में वृद्धि के लिए राज्य सरकार कम दर पर ऋण उपलब्ध कराती है।▸ राज्य सरकार द्वारा मत्स्य आहार मिल और मत्स्य बीज प्रजनन इकाइयों की स्थापना की गई है।
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