मैं पानी हूँ मैं जीवन हूँ मुझसे सबका नाता। मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ तीरथ भी बन जाता। मैं हूँ निर्मल पर दोष सभी, औरों के हर लेता। कल तक दोष तुम्हारे थे जो, अपने में भर लेता। पर सोचो तो मैं यों कब तक, कचरा भरता जाऊँ! मुझको जीवन भी कहते हैं, मैं कैसे मरता जाऊँ! गन्दा लहू बहा अपने में कब तक चल पाता तन। मैं धरती की सुन्दरता हूँ, हर प्राणी की धड़कन। मेरी निर्मलता से होगी, धरती पर हरियाली। फसलों में यौवन महकेगा, हर आँगन दीवाली। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया, कुआँ हो या कि सागर। रूप सभी ये मेरे ही हैं, एक बूँद या गागर। हर पौधे की हर पत्ती की प्यास बुझाऊँ जीभर। पर जीना दूभर होगा... Show more मैं पानी हूँ मैं जीवन हूँ मुझसे सबका नाता। मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ तीरथ भी बन जाता। मैं हूँ निर्मल पर दोष सभी, औरों के हर लेता। कल तक दोष तुम्हारे थे जो, अपने में भर लेता। पर सोचो तो मैं यों कब तक, कचरा भरता जाऊँ! मुझको जीवन भी कहते हैं, मैं कैसे मरता जाऊँ! गन्दा लहू बहा अपने में कब तक चल पाता तन। मैं धरती की सुन्दरता हूँ, हर प्राणी की धड़कन। मेरी निर्मलता से होगी, धरती पर हरियाली। फसलों में यौवन महकेगा, हर आँगन दीवाली। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया, कुआँ हो या कि सागर। रूप सभी ये मेरे ही हैं, एक बूँद या गागर। हर पौधे की हर पत्ती की प्यास बुझाऊँ जीभर। पर जीना दूभर होगा ये, दूषित हो जाने पर। Show less
मैं पानी हूँ मैं जीवन हूँ मुझसे सबका नाता। मैं गंगा हूँ, मैं यमुना हूँ तीरथ भी बन जाता। मैं हूँ निर्मल पर दोष सभी, औरों के हर लेता। कल तक दोष तुम्हारे थे जो, अपने में भर लेता। पर सोचो तो मैं यों कब तक, कचरा भरता जाऊँ! मुझको जीवन भी कहते हैं, मैं कैसे मरता जाऊँ! गन्दा लहू बहा अपने में कब तक चल पाता तन। मैं धरती की सुन्दरता हूँ, हर प्राणी की धड़कन। मेरी निर्मलता से होगी, धरती पर हरियाली। फसलों में यौवन महकेगा, हर आँगन दीवाली। नदियाँ, झरने, ताल-तलैया, कुआँ हो या कि सागर। रूप सभी ये मेरे ही हैं, एक बूँद या गागर। हर पौधे की हर पत्ती की प्यास बुझाऊँ जीभर। पर जीना दूभर होगा ये, दूषित हो जाने पर।
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