निम्नलिखित गद्यांश को सावधानी से पढ़िए और नीचे दिये गये प्रश्नों के सही उत्तर चुनिये : (प्रश्न संख्या 46-50 तक) अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना की भर्ती को महज उत्तर भारतीय सैन्य श्रम बाजार की प्रचलित परम्पराओं पर निर्मित नहीं किया जा रहा था। इसे ब्रिटिश साम्राज्य के अधिमानों के अनुसार‚ ढाला जा रहा था। उदाहरणतया‚ यह भर्ती ब्रिटिशों द्वारा अधिमानित उस परम्परा की प्रौढ़ता करती है जो कृषकों को सेना में भर्ती के लिए सर्वोत्तम सम्भाव्य सिपाही मानती है और उपनिवेशीय रूढ़ि के अनुसार‚ वे इस भर्ती के लिए चावाल खाने वालों की अपेक्षा गेहूँ खाने वाले भारतीयों को शारीरिक रूप से अधिक उपयुक्त मानते थे। यद्यपि सेना की भर्ती के लिए यह जातीय रूढ़िवादिता 18वीं शती की अपेक्षा 19वीं शती में आकर अधिक महत्वपूर्ण कारक बनी। सेना खड़ी करने के प्रारम्भिक पड़ाव के दौरान हेस्टिंग्ज ने सैन्य मामलों में मौजूदा जातीय नियमों से छेड़छाड़ करना नहीं चाहा। इसलिए तब कम्पनी की सेना ने मुख्यतया अवध से उच्च वर्ग के ब्राह्मण और जमींदार राजपूत तथा उत्तरी और दक्षिणी बिहार से भूमिहर एवं ब्राह्मण कृषक थे। ये दोनों क्षेत्र ही गेहूं के खपतकार है। ये लोग कम्पनी-सेना में इसलिए भर्ती हुए क्योंकि कम्पनी द्वारा वेतन‚ भत्ते‚ पेंशन और पुनर्वास के किए गए प्रावधान क्षेत्रीय राजाओं द्वारा किए गए प्रावधानों की अपेक्षा में कहीं बेहतर थे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि कम्पनी में पगार नियमित रूप से मिलती थी। सिपाहियों की जातीय‚ खान-पान‚ यात्रा एवं अन्य धार्मिक मान्यताओं को सम्मान देने की सोची-समझी नीति ने इस सेना को एक उच्च पहचान प्रदान की। इसलिए इस सेना में भर्ती होने से भूमिहर-ब्राह्मण जैसी नई महत्वाकांक्षी जाति के लोग सामाजिक रूप से ऊँचा उठने की अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकते थे। यद्यपि कार्नवालिस जो सेना के अंग्रेजीकरण को अधिमान देते थे फिर भी उन्होंने सेना के इस संगठन से छेड़छाड़ नहीं की जिसके फलस्वरूप कम्पनी के पास एक उच्च-जातीय सेना हो गई जो 1820 के दशक में अपने सामाजिक विशेषाधिकारों एवं मौद्रिक लाभों को घटाने से विद्रोहोन्मुखी हो उठी थी। कम्पनी के क्षेत्र जब 1770 के वर्षों में पश्चिम दिशा में बंगाल से पहाड़ी जंगल की तराई से आगे तक विस्तृत होने लगे और फिर 1802 में कुछ जिलों को जीता गया और साथ मिलाया गया तो एक बार फिर पहाड़ी आदिवासियों को सेना में भर्ती करने का प्रयास किया गया। कम्पनी ने मैदानी क्षेत्रों में तो भर्ती के लिए स्थायी केन्द्र खोल रखे थे मगर पहाड़ी स्थानों पर यह भर्ती स्थानीय सम्माननीय व्यक्तियों के माध्यम से की जाती थी और उन्हें अदायगी मुगलों की घाटवाली प्रणाली सेवा अवधि के आधार पर ही की जाती थी। भारतीय रियासतों‚ विशेषतया 18वीं शती के अन्त में मैसूर और 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मराठों को पराजय ने भर्ती के लिए सशस्त्र मानव शक्ति का एक विस्तृत अधिशेष जलाशय बना छोड़ा। मगर भारतीय राजाओं की सेनाओं से हटे समस्त सिपाहियों को कम्पनी-सेना में नहीं लिया जा सका। 1815 ई. में सेना की भर्ती नेपालियों में से गोरखा सिपाहियों और सिरमौर के पहाड़ी लोगों को भर्ती करने का नया प्रयोग किया गया। नेपाली सामरिक परम्परा और यूरोपीय प्रशिक्षण एवं अनुशासन के संयोग ने गोरखों को ब्रिटिश सेना के विश्वसनीय सिपाही बना दिया।46. कम्पनी की सेना में भर्ती का आधार था :

🎲 Try a Random Question  |  Total Questions in Quiz: 825  |  🧠 Study this quiz with Flashcards
This question is part of a full practice quiz:
UGC NET History Questions (in Hindi) From Previous Papers — practice the complete quiz, review flashcards, or try a random question.

800+ previosuly asked इतिहास questions.


निम्नलिखित गद्यांश को सावधानी से पढ़िए और नीचे दिये गये प्रश्नों के सही उत्तर चुनिये : (प्रश्न संख्या 46-50 तक) अठारहवीं शताब्दी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना की भर्ती को महज उत्तर भारतीय सैन्य श्रम बाजार की प्रचलित परम्पराओं पर निर्मित नहीं किया जा रहा था। इसे ब्रिटिश साम्राज्य के अधिमानों के अनुसार‚ ढाला जा रहा था। उदाहरणतया‚ यह भर्ती ब्रिटिशों द्वारा अधिमानित उस परम्परा की प्रौढ़ता करती है जो कृषकों को सेना में भर्ती के लिए सर्वोत्तम सम्भाव्य सिपाही मानती है और उपनिवेशीय रूढ़ि के अनुसार‚ वे इस भर्ती के लिए चावाल खाने वालों की अपेक्षा गेहूँ खाने वाले भारतीयों को शारीरिक रूप से अधिक उपयुक्त मानते थे। यद्यपि सेना की भर्ती के लिए यह जातीय रूढ़िवादिता 18वीं शती की अपेक्षा 19वीं शती में आकर अधिक महत्वपूर्ण कारक बनी। सेना खड़ी करने के प्रारम्भिक पड़ाव के दौरान हेस्टिंग्ज ने सैन्य मामलों में मौजूदा जातीय नियमों से छेड़छाड़ करना नहीं चाहा। इसलिए तब कम्पनी की सेना ने मुख्यतया अवध से उच्च वर्ग के ब्राह्मण और जमींदार राजपूत तथा उत्तरी और दक्षिणी बिहार से भूमिहर एवं ब्राह्मण कृषक थे। ये दोनों क्षेत्र ही गेहूं के खपतकार है। ये लोग कम्पनी-सेना में इसलिए भर्ती हुए क्योंकि कम्पनी द्वारा वेतन‚ भत्ते‚ पेंशन और पुनर्वास के किए गए प्रावधान क्षेत्रीय राजाओं द्वारा किए गए प्रावधानों की अपेक्षा में कहीं बेहतर थे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि कम्पनी में पगार नियमित रूप से मिलती थी। सिपाहियों की जातीय‚ खान-पान‚ यात्रा एवं अन्य धार्मिक मान्यताओं को सम्मान देने की सोची-समझी नीति ने इस सेना को एक उच्च पहचान प्रदान की। इसलिए इस सेना में भर्ती होने से भूमिहर-ब्राह्मण जैसी नई महत्वाकांक्षी जाति के लोग सामाजिक रूप से ऊँचा उठने की अपनी आकांक्षाओं को पूरा कर सकते थे। यद्यपि कार्नवालिस जो सेना के अंग्रेजीकरण को अधिमान देते थे फिर भी उन्होंने सेना के इस संगठन से छेड़छाड़ नहीं की जिसके फलस्वरूप कम्पनी के पास एक उच्च-जातीय सेना हो गई जो 1820 के दशक में अपने सामाजिक विशेषाधिकारों एवं मौद्रिक लाभों को घटाने से विद्रोहोन्मुखी हो उठी थी। कम्पनी के क्षेत्र जब 1770 के वर्षों में पश्चिम दिशा में बंगाल से पहाड़ी जंगल की तराई से आगे तक विस्तृत होने लगे और फिर 1802 में कुछ जिलों को जीता गया और साथ मिलाया गया तो एक बार फिर पहाड़ी आदिवासियों को सेना में भर्ती करने का प्रयास किया गया। कम्पनी ने मैदानी क्षेत्रों में तो भर्ती के लिए स्थायी केन्द्र खोल रखे थे मगर पहाड़ी स्थानों पर यह भर्ती स्थानीय सम्माननीय व्यक्तियों के माध्यम से की जाती थी और उन्हें अदायगी मुगलों की घाटवाली प्रणाली सेवा अवधि के आधार पर ही की जाती थी। भारतीय रियासतों‚ विशेषतया 18वीं शती के अन्त में मैसूर और 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मराठों को पराजय ने भर्ती के लिए सशस्त्र मानव शक्ति का एक विस्तृत अधिशेष जलाशय बना छोड़ा। मगर भारतीय राजाओं की सेनाओं से हटे समस्त सिपाहियों को कम्पनी-सेना में नहीं लिया जा सका। 1815 ई. में सेना की भर्ती नेपालियों में से गोरखा सिपाहियों और सिरमौर के पहाड़ी लोगों को भर्ती करने का नया प्रयोग किया गया। नेपाली सामरिक परम्परा और यूरोपीय प्रशिक्षण एवं अनुशासन के संयोग ने गोरखों को ब्रिटिश सेना के विश्वसनीय सिपाही बना दिया।<br />46. कम्पनी की सेना में भर्ती का आधार था :