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छत्तीसगढ़ राज्य की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या का जीवन यापन कृषि पर निर्भर है। प्रदेश के 37.46 लाख कृषक परिवारों में से 76 प्रतिशत लघु एवं सीमांत श्रेणी में आते हैं। वर्तमान में प्रदेश के सभी सिंचाई स्रोतों से लगभग 36 प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है जिसमें से सर्वाधिक 52 प्रतिशत क्षेत्र जलशयों/ नहरों के माध्यम से सिंचित है एवं 29 प्रतिशत क्षेत्र नलकूप से सुनिश्चित सिंचाई के अन्तर्गत आते हैं। अधिकांशत: वर्षा पर निर्भर है। प्रदेश की लगभग 55 प्रतिशत काश्त भूमि की जलधारणा क्षमता कम होने के कारण, बिना सिंचाई साधन के दूसरी फसल लेना संभव नहीं है। फसल उत्पादन (000 मीट्रिक टन) क्र. फसल 2017 पूर्ति 2018 अनुपूर्ति वृद्धि/कमी प्रतिशत खरीफ1. धान 4725.54 8445.15 792. मक्का 557.49 577.26 43. अरहर 79.53 106.88 344. मूंग 11.23 14.12 265. उड़द 54.53 60.33 116. मूंगफली 88.35 97.83 117. सोयाबीन 60.94 132.48 1178. रामतिल 16.42 17.63 79. अन्य 62.88 69.21 10महायोग 5656.91 9520.89 68रबी1. धान 231.07 166.71 282. मक्का 145.21 194.24 343. गेहूं 279.66 304 94. चना 390.27 490.76 265. मटर 20.28 29.04 436. तिवड़ा 1611 18.72 16फसल क्षेत्र का राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (स्थिर भाव) में भागीदारी वर्ष2018–19 में ` 24,18,422 लाख अनुमानित है। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत प्रदेश में एक उर्वरक गुण नियंत्रण प्रयोगशाला, कृषि यंत्र परीक्षण प्रयोगशाला तथा कृषि प्रशिक्षण अकादमी की स्थापना की गई है। वर्ष 2017-18 में फल 2.61.518 हेक्टेयर, सब्जी 4,74, 701 हेक्टेयर मसाला 1,00,980हेक्टेयर, औषधीय एवं सुगंधित फसल 8,745 हेक्टेयर पुष्प 13,200 हेक्टेयर में लगाए गए हैं जिनसे क्रमश: 25,92,450 टन, 67,54,610 टन, 7,15,517 टन, 61,948 टन, 60, 689टन उत्पादन हुआ है। प्रदेश में वृहद, माध्यम एवं लघु सिंचाई योजनाओं से मार्च 2018 की स्थिति में 2088लाख हेक्टेयर सिंचित क्षेत्र है।
राज्य में कृषि भूमि का उपयोग तथा उत्पादन एवं जलवायु की दृष्टि से सम्पूर्ण प्रदेश को मुख्यत: तीन कृषि जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है।1. छत्तीसगढ़ का मैदान2. बस्तर (दण्डकारण्य) का पठार3. उत्तरी मैदानी क्षेत्र
▸ छत्तीसगढ़ राज्य का मैदान अपेक्षतया समतल क्षेत्र है।▸ यहाँ भूमि ढाल कम है एवं यहाँ की लाल-पीली व कछारी मिट्टी अपेक्षाकृत उपजाऊ है।▸ इस क्षेत्र में कृषि कार्य अपेक्षाकृत अधिक विकसित है। यह दो फसली क्षेत्र है।▸ रबी में गेहूँ तथा तिलहन में अलसी व सरसों (रबी में), तिल (खरीफ में) आदि बोई जाती है।▸ नगदी फसलों के अन्तर्गत गन्ने की फसल मुख्यत: बस्तर, बिलासपुर रायगढ़, सरगुजा, कवर्धा, दुर्ग, रायपुर जिलों में बोई जाती हैं।
कृषि जलवायु क्षेत्र फसल जिले बस्तर का पठार चावल, गेहूँ, कोंदो, कुटकी, मक्का, अरहर, चना, कुल्थी, तिल, तिवरा, आलू एवं सब्जियाँ बस्तर, दन्तेवाड़ा, कांकेर7. रोई-सरसों 25.49 33.72 328. अलसी 62.02 77.66 259. अन्य 283.95 478.63 69महायोग 1454.06 1793.48 23छत्तीसगढ़ का मैदान चावल, कोंदो, कुटकी, गेहूँ, अरहर, मूँग, चना, तिल, सरसों, मूँगफली, अलसी, सोयाबीन, सब्जियाँ रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, महासमुन्द, धमतरी, कोरबा, जांजगीर-चाँपा उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र कोंदो, कुटकी, चावल, गेहूँ, अरहर, तिल, लेनतिल, मूँगफली, सरसों, बरसीम, आलू एवं सब्जियाँ सरगुजा, जशपुर कोरिया एवं रायगढ़
▸ पहाड़ी एवं पठारी होने तथा वनों से आच्छादित होने के कारण यह क्षेत्र कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त है।▸ इस क्षेत्र में लाल-रेतीली मिट्टी पाई जाती है, जिसकी उर्वरता कम होती है।▸ सिंचाई का समुचित विकास न होने के कारण इस क्षेत्र में कृषि काफी पिछड़ी हुई है।▸ इस क्षेत्र की भूमि आलू की खेती के लिए उपयुक्त है।▸ इस क्षेत्र की प्रमुख फसलें कोंदो, कुटकी, ज्वार, चावल, मक्का, चना, तुअर, तिल, अलसी, सरसों तथा सोयाबीन हैं। उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र▸ पठारी एवं पहाड़ी बनावट के कारण इस क्षेत्र का अधिकांश भाग छिछली, कंकरीली, पथरीली एवं लाल-पीली मिटि्टयों वाला है।▸ अत: ये मिटि्टयाँ पोषक तत्वों की कमी के कारण कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त हैं।▸ इस क्षेत्र में अधिकांश भूमि वनों से आच्छादित है।▸ इस क्षेत्र की प्रमुख फसल चावल, ज्वार, मक्का, गेहूँ, चना, तुअर, मूँगफली, तिल, अलसी, सरसों, गन्ना तथा मिर्च-मसाले आदि हैं।
राज्य में खरीफ, रबी एवं जायद तीनों प्रकार की फसलें उपजाई जाती हैं। परन्तु मुख्य कृषि खरीफ में होती है। गेहूँ▸ प्रदेश में कुल 86.5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूँ उगाया जाता है।▸ गेहूँ के अन्तर्गत कम क्षेत्रफल (1.5%) का मुख्य कारण शीतकाल में ¯सचाई की सुविधाओं की कमी है।▸ प्रति हेक्टेयर उपज में महासमुन्द का स्थान प्रथम है इसके बाद कांकेर, जांजगीर-चाँपा, कोरबा का स्थान है। कोंदो-कुटकी▸ कोंदो-कुटकी मोटे अनाज की फसलें हैं।▸ प्रदेश में इनका सम्मिलित क्षेत्रफल 300.1 हजार हेक्टेयर है। प्रदेश में लगभग 6%कृषि भूमि में इनका उत्पादन किया जाता है। चावल▸ यह राज्य की मुख्य फसल है। यहाँ सर्वाधिक उत्पादन चावल का ही होता है, जो कुल कृषि खाद्यान्न फसलों का 83.53% होता है।▸ प्रदेश में कुल कृषि योग्य भूमि के 67% भाग में चावल की खेती होती है एवं प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन लगभग 2,160 किग्रा है। सोयाबीन▸ यह प्रदेश की कुल कृषि भूमि के 0.85% क्षेत्र (48,311 हेक्टेयर) में बोई जाती है।▸ इस तरह यह खरीफ की प्रमुख तिलहन फसल है।▸ कुल तिलहन में 13.85% उत्पादन इसी का होता है, जबकि यह कुल तिलहन फसल के 7.21% क्षेत्र में बोई जाती है। अरहर▸ यह एक प्रमुख दलहन फसल है।▸ इसे राज्य के कुल कृषि भूमि के 0.72% क्षेत्र में (40,938 हेक्टेयर) जुलाई-अगस्त में बोया जाता है तथा मार्च-अप्रैल में काटा जाता है।▸ इसे वर्षा के आरम्भ में कपास एवं ज्वार के साथ बोया जाता है। मक्का▸ मक्का की खेती राज्य की कुल कृषि भूमि के 1.63% क्षेत्र में की जाती है।▸ यह प्रदेश के सभी हिस्सों में बहुत छोटे पैमाने पर उगाई जाती है।▸ सरगुजा, बस्तर, दन्तेवाड़ा, कोरिया, जशपुर, कोरबा, बिलासपुर आदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। ज्वार▸ ज्वार खरीफ एवं रबी दोनों की फसल है, लेकिन ज्वार का खरीफ क्षेत्र अधिक है। ज्वार राज्य में बहुत कम 0.19% में बोई जाती है एवं प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन लगभग 9.65 क्विण्टल है। कपास▸ कपास का उत्पादन छत्तीसगढ़ में नहीं होता यद्यपि दन्तेवाड़ा, बस्तर, सरगुजा एवं धमतरी जिलों में अत्यल्प क्षेत्र में इसकी खेती की जा रही है।▸ केन्द्रीय पोषित सघन कपास विकास कार्यक्रम जगदलपुर, दन्तेवाड़ा और कांकेर जिलों में चलाया जा रहा है। सन तथा मेस्टा इसका उत्पादन केवल रायगढ़ में होता है, क्योंकि यहाँ इस राज्य की एकमात्र जूट मिल स्थापित है। सनई इसका उत्पादन केवल रायगढ़ जिले में होता है, जो यहाँ की जूट मिलों के लिए जूट के विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है। सरसों▸ सरसों राज्य की प्रमुख तिलहन फसलों में से एक है।▸ सरसों की भाजी व फल का यहाँ विशेष महत्व है। इसकी भाजी का साग यहाँ पसन्द किया जाता है। अलसी▸ यह राज्य की परम्परागत रबी तिलहन है, जिसका उपयोग प्राचीन समय से यहाँ के लोग खाद्य तेल के रूप में करते आए हैं।▸ प्रदेश में यह उत्तरा फसल के रूप में बोई जाती है।▸ अलसी सम्पूर्ण प्रदेश की सर्वाधिक लोकप्रिय तिलहन है। चना▸ राज्य में चना कुल दलहन उत्पादक क्षेत्र के 20.31% भाग पर उगाया जाता है।▸ इसका प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 714 किग्रा है। यह रबी की प्रमुख फसल है।▸ चने के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र दुर्ग, कवर्धा, बिलासपुर, राजनांदगांव, रायपुर आदि हैं। गन्ना▸ राज्य में गन्ने की खेती यदा-कदा की जाती है।▸ इसकी खेती राजनांदगांव, कवर्धा, दुर्ग, रायपुर तथा इसके आसपास के क्षेत्रों में की जा रही है। मूँगफली▸ यह प्रदेश के कुल बोए गए क्षेत्र के 0.6% भाग में बोई जाती है तथा कुल तिलहन के 10.23% क्षेत्र में बोई जाती है।▸ यह प्रदेश में रायगढ़, महासमुन्द, सरगुजा, बिलासपुर, जांजगीर-चाँपा, रायपुर जिलों में मुख्यत: बोई जाती है।▸ मूँगफली का उपयोग तेल एवं भोज्य पदार्थ दोनों के लिए किया जाता है। उड़द▸ दलहन में चने के बाद उड़द का दूसरा स्थान है।▸ यह लगभग 2.18% भूमि में बोई जाती है। इसका औसत उत्पादन लगभग 3.0क्विण्टल प्रति एकड़ होता है।▸ इसके उत्पादन में अग्रणी जिले रायगढ़, कोरबा, धमतरी एवं महासमुन्द हैं, जबकि आवश्यकतानुसार यह सभी जिलों में बोई जाती है।
▸ प्रदेश में 59,900 मिलियन क्यूबिक मीटर भू-जल उपलब्ध है, जिसमें से लगभग50% भाग के पानी का उपयोग किया जा सकता है।▸ केन्द्रीय जल आयोग के अनुमान के अनुसार, प्रदेश में कुल उपलब्ध जल से लगभग33.00 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता विकसित की जा सकती है।
छत्तीसगढ़ में मुख्य रूप से चार प्रकार से सिंचाई होती है। ये हैं-नहरें, तालाब, कुएँ तथा नलकूप।
राज्य में शुद्ध सिंचित क्षेत्र का लगभग 66.05% क्षेत्र नहरों द्वारा सिंचित किया जा रहा है।
▸ छत्तीसगढ़ के मात्र 3.37% क्षेत्र पर तालाबों से सिंचाई की जाती है। प्राचीनकाल से ही यहाँ तालाबों से सिंचाई की जाती है।▸ तालाबों के अतिरिक्त छोटे नालों को बाँध कर भी यहाँ सिंचाई की जाती है, जिसे राज्य में टार कहा जाता है।
▸ छत्तीसगढ़ के कृषि क्षेत्र के 28.65% क्षेत्र पर नलकूप तथा अन्य साधनों से सिंचाई की जाती है।
▸ 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में विशेषकर धान क्षेत्र अर्थात् रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग इत्यादि क्षेत्रों की विभिन्न नहरों को बनाकर नहरों द्वारा सिंचाई कार्य प्रारम्भ किया गया।▸ राज्य में 7 वृहद्, 33 मध्यम एवं 2335 लघु सिंचाई योजनाएँ पूर्ण हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त 4 वृहद्, 6 मध्यम एवं 412 लघु सिंचाई योजनाएँ निर्माणाधीन हैं एवं प्रदेश में लगभग 170 से अधिक सिंचाई परियोजनाएँ सर्वेक्षणाधीन हैं।▸ राज्य का शुद्ध बोया गया क्षेत्र 58.3 लाख हेक्टेयर है।▸ प्रदेश की निर्माण सिचाई क्षमता 14.11 लाख हेक्टेयर है, जिसके विरुद्ध वास्तविक सिंचाई क्षमता 13.28 लाख हेक्टेयर है, जोकि शासकीयोतों में राज्य में निर्मित सिंचाई क्षमता का 23% है।
▸ हसदेव-बाँगो बहु-उद्देशीय परियोजना को वर्तमान में मिनीमाता बाँगो परियोजना के नाम से जाना जाता है। यह हसदेश बांगो-नदी पर निर्मित है।
▸ यह परियोजना वर्ष 1920 में प्रारम्भ हुई तथा वर्ष 1931 में पूर्ण हुई। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 132 सेमी है तथा जल संग्रहण क्षेत्र 613.60 वर्ग किमी है।▸ खारंग, अरपा नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है।
यह परियोजना अरपा नदी पर स्थित है।
यह परियोजना धमतरी जिले में महानदी पर स्थित है, जोकि राज्य की सबसे पुरानी सिंचाई परियोजना है। इससे 2.20 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई की जाती है। अन्य प्रस्तावित एवं निर्माणाधीन परियोजनाएँ श्याम परियोजना घुनघुट्टा नदी पर अम्बिकापुर केलो परियोजना केलो नदी, रायगढ़ माण्ड परियोजना माण्ड नदी, रायगढ़ चिरपानी परियोजना कवर्धा महान् परियोजना सूरजपुर सूखा नाला बैराज यह मध्य परियोजना राजनांदगांव जिले के डोंगरगाँव तहसील के ग्राम बह्मनीकनेरी के पास सूखा नाला में प्रस्तावित है। घुमरिया नाला बैराज परियोजना घुमरिया नाला बैराज परियोजना राजनांदगांव जिले के ग्राम जोशीलमती के समीप घुमरिया नाला पर निर्माणाधीन है।
▸ वर्ष 1975 में प्रारम्भ एवं वर्ष 1993 में पूर्ण जोंक परियोजना महानदी की सहायक नदी जोंक पर रायपुर जिले में स्थित है।
▸ यह रायपुर जिले के पास कोकराझार के समीप महानदी की सहायक नदी कोडार पर स्थित है।▸ इस परियोजना में 2,360 मी लम्बा तथा 23.22 मी ऊँचा बाँध बना है।▸ इस परियोजना के द्वारा 16,760 हेक्टेयर खरीफ एवं 6,720 हेक्टेयर रबी अर्थात् कुल23,480 हेक्टेयर भूमि सिंचित है।
▸ यह जल परियोजना घोंघा नाला पर स्थित है।▸ इस परियोजना से वर्ष 1980-81 से सिंचाई प्रारम्भ हुई।▸ इस क्षेत्र की कुल कृषि योग्य भूमि 10,899.30 हेक्टेयर और परियोजना द्वारा कुल7,330,481 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती है।
▸ इस परियोजना का निर्माण बिलासपुर जिले की कोण्टा तहसील के ग्राम भैंसाझार के समीप किया गया है।▸ इस परियोजना से 7,300 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है।
▸ पैरी परियोजना गरियाबन्द जिले की सिकासार तहसील में स्थित है।▸ इस परियोजना में पैरी नदी पर सिकासार ग्राम में सिकासार बाँध एवं 35 किमी नीचे की ओर नदी पर कुकदा पिक वियर का निर्माण सम्मिलित है।
▸ मनियारी परियोजना, मनियारी नदी पर, जो शिवनाथ नदी की प्रमुख सहायक नदी है, निर्मित की गई है। खुड़िया बाँध, मुंगेली जिले की लोरमी तहसील में मनियारी नदी पर बनाया गया है।▸ यह परियोजना वर्ष 1924 में प्रारम्भ की गई थी तथा वर्ष 1930 में पूर्ण हुई।▸ यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 115 सेमी है तथा जल ग्रहण क्षेत्र 802.90 वर्ग मी है।
महानदी कमाण्ड क्षेत्र में 34,000 हेक्टेयर सिंचाई कुकदा पिकअप में पुराने रुद्री बियर से बढ़े हुए रकबा के अनुपात मे जल वृद्धि को दृष्टिगत रखते हुए रुद्री बैराज का निर्माण वर्ष 1993 में किया गया है तथा महानदी कमाण्ड क्षेत्र में अब न्यू रुद्री बैराज द्वारा प्रदान किया जाता है।
▸ इसमें कुल 2,025 हेक्टेयर वन क्षेत्र में से मध्य प्रदेश शासन द्वारा वर्ष 1979 से 944हेक्टेयर वन क्षेत्र की स्वीकृति दी गई थी।▸ इस योजना का निर्माण वर्ष 1988 में सोंदूर नदी पर प्रारम्भ किया गया था।▸ अतिरिक्त वन क्षेत्र 1,081 हेक्टेयर की स्वीकृति के सम्बन्ध में प्रस्ताव भारत शासन वन एवं पर्यावरण मन्त्रालय को स्वीकृति हेतु भेजा गया।
▸ वर्ष 1915 में रुद्री पिकअप बियर का निर्माण किया गया, जिससे 33,033 हेक्टेयर में सिंचाई प्रस्तावित की गई थी। तत्पश्चात् वर्ष 1923 में मुरुमसिल्ली जलाशय का निर्माण हुआ, जिससे सिंचाई क्षमता 33,033 हेक्टेयर से बढ़कर 85,000 हेक्टेयर हुई तथा वर्ष 1962 में महानदी पर दुधवा जलाशय का निर्माण किया गया, जिससे सिंचित क्षेत्र 1,36,500 हेक्टेयर हो गया।
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