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v करमा-आदिवासी स्त्री-पुरुष का यह सामूहिक नृत्य कर्म देवता को खुश करने के लिए किया जाता है। यह काफी विस्तृत रूप से किया जाता है। लय ताल के आधार पर इसके चार रूप हैं-करमा खरी, करमा खाय, करमा झुलनी और करमा लहकी। बैगा जाति का करमा बैगानी-करमा कहलाता है।v गौर नृत्य-मुड़िया जनजाति (बस्तर) से सम्बन्धित इस नृत्य को खुशी के अवसर पर, विशेषकर नई फसल के समय किया जाता है। इसमें माड़िया युवक गौर नामक पशु के सींग कौड़ियों से सजाकर सिर पर धारण करते हैं और अत्यन्त आकर्षक ढंग से नाचते हैं। इसे वारियर ऐल्विन ने देश का सर्वश्रेष्ठ नृत्य कहा था।v ददरिया या दहरिया-यह प्रणय नृत्य है। एक गाँव के युवक नृत्य करते हुए दूसरे गाँव जाते हैं। जहाँ युवतियाँ इनका स्वागत करती है। इस दौरान युवक अपनी पसन्द का जीवन साथी चुन लेते हैं।v गेंडी नृत्य-मुड़िया आदिवासी (बस्तर) युवक लकड़ी की ऊँची गेंडी (लकड़ी की बनी) पर चढ़कर तेज गति से नृत्य करते हैं। इसमें शारीरिक कौशल और सन्तुलन महत्त्व रखता है। घोटुल नामक युवागृह के अन्दर तथा बाहर इस नृत्य को विशेष रूप से किया जाता है, जिसे डिटोंग कहते हैं यह गीत रहित नृत्य है।v मांडरी नृत्य-घोटुल समाज में मुरिया युवक और युवतियों द्वारा पृथक्-पृथक् गीत रहित नृत्य किया जाता है। एक व्यक्ति संचालन करता है।v राउत नृत्य-अंचल का महत्त्वपूर्ण लोक नृत्य है जिसमें अहीर जाति के लोग बड़े उत्साह से भाग लेते हैं। यह देवउठनी एकादशी के पश्चात् आयोजित होते हैं।v हुलकी पाटा नृत्य-यह भी मुरिया आदिवासियों का नृत्य है। इस नृत्य का प्रधान आकर्षण है इसके गीत। यह स्त्री-पुरुष का सामूहिक नृत्य है।v ककसार-मुड़िया आदिवासियों (बस्तर) द्वारा अपने देवता 'लिंगा देव' को प्रसन्न करने हेतु यह गीत नृत्य किया जाता है। इस अवसर पर जो गीत गाए जाते हैं उसे ककसार पाटा कहते हैं।v परधौनी नृत्य-बैगा आदिवासियों का यह नृत्य बारात पहुँचने के समय किया जाता है। लड़के वाले हाथी बनाकर नाचते हैं।v सरहुल नृत्य-उरांव जनजाति द्वारा सरई वृक्ष (जिसमें उनके देवता निवास करते हैं) के चारों ओर चैत्रमास-पूर्णिमा को किया जाता है।
राज्य के विभिन्न भागों में नाट्य परम्पराग सुदृढ़ रूप में स्थापित है। विश्व की प्रथम नाट्य शाला छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में रामगढ़ गुफा में मौजूद है, यह लगभग 300 ईसा पूर्व की है।v भतरानाट-बस्तर क्षेत्र में किया जाता है। इसे उडिया नाट भी कहते हैं (सम्भवत: उड़ीसा से आया है)। प्रमुख नाट गुरू होता है। इसमें सभी पुरुष मुखौटे लगाते हैं। यह पुरुषों का ही नाट्य है। भतरी भाषा में खेला जाता है और इसकी विषय-वस्तु पौराणिक होती है जैसे कीचक वध, अभिमन्यु वध आदि।v नाचा-छनीसगढ़ बोली में खेला जाने वाला 'नाचा' सामाजिक रूढ़ियों, विकृत परम्पराओं तथा अंध विश्वासों पर व्यंगात्मक प्रहार करता है। इसका मंच, पोषाक तो साधारण होती ही है, चेहरे की सजावट भी मात्र खड़िया, गेरू से हो जाती है। इसका प्रमुख पात्र नर्तक (नाचकार) होता है। दूसरा प्रमुख पात्र विदुषक होता है। प्रसंगों को गीत, संवाद आदि से प्रस्तुत करते हैं। रेवली नाचा, यहाँ की पहली संगठित नाचा पार्टी-1928 में दुलारा सिंह 'मंदराजी' द्वारा स्थापित की गई थी।v माओपाटा-मुड़िया जनजाति (बस्तर) की शिकार नाटिका है। इसमें गाय-भैंस के सामूहिक शिकार करने की नकल की जाती है।v रहस-यह बृज (उ.प्र.) से छत्तीसगढ़ में आया है। कृष्ण की विविध लीलाओं को संगीत, नृत्य, अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह छत्तीसगढ़ी रासलीला है जो 9 से 11 दिनों तक चलती है।
v छत्तीसगढ़ के सबसे प्राचीन लोक कला चिह्न प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं पर मिले हैं और ये चित्र आज की समग्र चित्र परम्परा से काफी मिलते-जुलते हैं।v हरियाली अमावस्या को दीवारों पर गोबर से सवनाही का अंकन किया जाता है। इसमें मानव और पशुओं की आकृति उकेरी जाती है। माना जाता है कि सवनाही से बाहरी बाधाएँ प्रवेश नहीं करती है।v छत्तीसगढ़ की महिलाएँ गुदना प्रिय है। बहुत-सी जनजातियों में गुदना प्रथा आज भी विशेष महत्त्व रखती है।v कृष्ण जन्माष्टमी पर मिटी्ट के रंगों से दीवार पर आठे कन्हैया नामक कथात्मक चित्र उकेरा जाता है।v विवाह आदि अवसरों पर भी यहाँ के लोग विभिन्न बनाते हैं, विशेषकर चितेरे जाति के लोग ऐसे अवसर पर मिटी्ट के रंगों से अद्भुत चित्र बनाने में पारंगत हं।ै मूलत: उड़ीसा की चितेरे जाति के इन चित्रों को बालपुर लोकचित्र शैली का नाम दिया गया है।
v बरुआ गीत-उपनयन संस्कार से सम्बन्धित है इस गीत में बरूआ अपने सम्बन्धियों से भिक्षा माँगता है।v पठौनी गीत-संस्कार प्रधान सर्वप्रमुख लोकगीत पठौनी है।v सोहर गीत-जन्म संस्कार से सम्बन्धित है।v बिहाव गीत-विवाह समारोह के अवसर पर गाया जाता है।
v राउत गीत-कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष एकादशी के प्रारम्भ होने वाले 10 दिवसीय उत्सव में यह नृत्य गीत गाया जाता है।v सुआ गीत-दीपावली पर 'सुआ' के लिए गए जाने वाला रस प्रधान गीत। यह विशेष रूप से गोंड स्त्रियाँ गाती हैं।v छेर-छेरा गीत-माघ मास में पूर्णिमा के दिन छेर-छेरा पुन्नी नामक त्यौहार पर गाया जाने वाला गीत है।
v बारहमासी-जेठ माह से प्रारम्भ इस गीत में ऋतुओं की महिमा का बखान किया जाता है।v फाग गीत-बसन्त ऋतु में गाया जाता है विशेषकर होली के आसपास।v सवनाही गीत-सवनाही, वर्षा ऋतु का प्रमुख गीत है।
v माता सेवा गीत-चेचक माता की शान्ति के लिए गाया जाने वाला गीत।v जॉवरा गीत-दुर्गामाता की आरती गाई जाती है। अन्य देवताओं की भी स्तुति होती है।v कार्तिक स्नान गीत-कार्तिक माह में कुआँरी कन्याओं द्वारा गाया जाता है।v गौरा गीत-नवरात्र में देवी माँ की स्तुति स्त्रियों द्वारा की जाती है।v भोजल (कजली) गीत-सावन माह में महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला हरियाली गीत है।
v ढोला मारू गीत-मूलत: राजस्थानी प्रेमगीत है जो यहाँ भी गाया जाता है।v ददरिया गीत-सौन्दर्य और शृंगार प्रधान ददरिया गीत छत्तीसगढ़ लोक गीतों का राजा कहलाता है।v देवरा गीत-यह भी लोक कथा पर आधारित है और देवार जाति के लोग नाचते हुए गाते हैं।
v शिक्षा गीत-माता-पिता इस गीत के द्वारा बच्चों को कुछ शिक्षा देते हैं।v लोरी गीत-मा द्वारा शिशु को सुलाने हेतु गाया जाता है।v खेलगीत-बच्चे खेलते समय गाते हैं। इनमें बैइठे फुगड़ी (बैठकर गाया जाने वाला), खड़े फुगड़ी (खड़े रहते हुए गाया जाने वाला), खुडुवा, डांडी-पौहा आदि हैं।
v लोरिक चन्देनी गीत-ग्रामीण क्षेत्रों में गाया जाता है।v करमा गीत-आदिवासी महिला-पुरुषों का सामूहिक गीत। इसमें कर्म और शृंगार का अद्भुत संगम है।v सन्ध्या गीत-कुंवारी कन्याओं द्वारा दीवार पर मिटी की सन्ध्या देवी बनाकर सामूहिक रूप से गाया जाता है।v बैना गीत-देवी-देवताओं को प्रसन्न रखने हेतु तन्त्र-मन्त्र प्रधान गीत है।v मांझी गीत-जशपुर पहाड़ी के आदिवासियों का यह नृत्यगीत भारत महोत्सव रूस में प्रदर्शित हो चुका है।v डन्डा गीत-पौष पूर्णिमा को गाया जाने वाला नृत्य गीत है।v ककसार पाटा-भूरिया आदिवासी 'लिंगादेव' को प्रसन्न करने हेतु गाते हैं।v पंथी गीत-सतनामी सम्प्रदाय का नृत्य प्रधान आध्यात्मिक गीत।
v पडवानी गायक-झाडूराम देवांगन, पुनाराम निषाद, तीजन बाई, ऋतु वर्मा, प्रभा यादव, रेखा यादव, रेवाराम, गंजीर, शान्तिबाई चेलक, लक्ष्मीबाई बंजारे, बृजलाल पारधी।v भरथरी गायक-सूरजबाई खाण्डे, रेखा जलक्षत्री।
v देवार-देवार छत्तीसगढ़ के परम्परागत लोकगायक हैं। पारम्परिक रूप से रायपुरिहा देवार के सारंगी पर और रतनपुरिहा देवार ढुंगरु वाद्य के साथ संगत करते हैं। देवार पारंपरिक रूप से चंदा रउताइन, दसमत, सीताराम-गायक, नगेसर कैना, गोडवानी और पंडवानी कथा-गायकी के साथ बन्दर का खेल भी दिखाते हैं।v बसदेवा-बसदेवा की बस्तियाँ गाँव के बाहर जंगलों के निकट होती थी-'बसदेवा बसे पहाड़ कि हरे मोर रामजी।' इनका मुख्य कर्म गायकी रहा है। बसदेवा को 'हरबोला' या 'जृग गंगान' भी कहा जाता है।
v छत्तीसगढ़ में चुटकी-मुटकी, कौआ और गौरेया, बावत के माया, बाघिन और छेरिया, चिरई और झर, हाथी और गीदड़, बकरी और शेर, राजा के लाल, देवान के लाल, सीता–बसंत आदि सामाजिक, मनोरंजनात्मक लोक कथाएँ प्रचलित हैं।
v पंडवानी, भरथरी, ढोलामारू, चन्दनी, राजा वीरसिंह की गाथा, सरवन कुमार की गाथा, सीता बसन्त, घनकुल, जुगार, जसमा, दसमत अनेक लोक गाथाएँ यहाँ प्रचलित हैं।
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