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प्राचीन छत्तीसगढ़पाषाण और प्रागैतिहासिक काल▸ छत्तीसगढ़ से प्रागैतिहास युग (3000 B.C. से पूर्व) के अवशेष मिले हैं।▸ सिंघनपुर (रायगढ़) और महानदी बेसिन से सबसे प्राचीनतम अर्थात पुरापाषाण कालीन(10 हजार B.C. से पूर्व) औजार मिले हैं।▸ नव पाषाण युग (9000–6000 B.C) के औजार अर्जुनी (बालौद), टेरम (रायगढ़) और राजनांदगांव से मिले हैं।▸ धनौरा (बालोद) से सर्वाधिक महापाषाण युगीन अवशेष मिले हैं।▸ प्रागैतिहासिक युग के शैलाश्रय (चट्टानों पर चित्रांकन) सिंघनपुर (रायगढ़) की कबरा पहाड़ियों में तथा राजनान्दगांव की चितवा डोंगरी में आज भी मौजूद हैं।▸ उक्त अवशेष पाषाण युग में छत्तीसगढ़ को मानवीय गतिविधियों का केन्द्र सिद्ध करते हैं।
▸ ऋग्वेद में छत्तीसगढ़ क्षेत्र का उल्लेख किसी ज्ञात नाम से नहीं मिलता।▸ लेकिन उत्तर वैदिक ग्रन्थों (1000–500 B.C.) में इस प्रदेश का उल्लेख कोसल नाम से हुआ है।▸ राजा कोसल के नाम पर ही नागपत्तन कोसल कहलाने लगा।▸ इन्हीं के एक वंशज राजा भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह अयोध्या के राजा दशरथ से हुआ था।▸ राजा दशरथ को भानुमंत की मृत्यु के बाद उसका दक्षिण कोसल (छ.ग. का प्राचीन नाम) राज्य प्राप्त हो गया था।▸ उत्तर कोसल राज्य पूर्वी (पूर्वी उत्तर प्रदेश) पहले से ही स्वयं दशरथ का था।▸ रामायण में ही राम द्वारा दण्डकारण्य में वनवास व्यतीत करने का जिक्र है, जिसकी समता बस्तर से की जाती है। शिवरीनारायण में राम ने शबरी के जूठे बेर खाए थे।▸ खरौंद भी राम से जुड़ी हुई जगह है।▸ यहाँ सीताबेंगरा (सीता का निवास), लक्ष्मण झूला आदि के साक्ष्य मौजूद हैं।▸ महाभारत मे कर्ण की कोसल विजय, सहदेव की प्रक्कोसल विजय, अजुर्न पुत्र वभवु्रा हन की राजधानी सिरपुर तथा अर्जुन के श्वसुर चित्रवास की राजधानी चित्रांगदपुर का जिक्र है।▸ बस्तर के अरण्य क्षेत्र को 'कान्तार' कहा गया है।▸ राजा नल ने दक्षिण दिशा का मार्ग बनाते हुए भी विन्ध्य के दक्षिण में कोसल राज्य का उल्लेख किया था।▸ महाभारतकालीन ऋषभतीर्थ भी बिलासपुर जिले में सक्ती के निकट 'गुंजी' नामक स्थान से समीकृत किया जाता है। मोरध्वज और ताम्रध्वज की राजधानी 'मणिपुर' का तादात्म्य वर्तमान 'रतनपुर' से किया जाता है।
▸ 'अवदान शतक' नामक एक ग्रन्थ के अनुसार महात्मा बुद्ध दक्षिण कोसल आये थे तथा लगभग तीन माह तक यहाँ की राजधानी में उन्होंने प्रवास किया था।▸ ऐसी जानकारी बौद्ध यात्री व्हेनसांग के यात्रा वृत्तांत से भी मिलती है।▸ नन्दों ने ओड़िसा को जीतने के पूर्व दक्षिण कोसल को विजित किया था।▸ तारापुर, आरंग, उडेला आदि स्थानों से कुछ आहत मुद्राएं प्राप्त हुई हैं, जिनका वजन12 रत्ती का है अत: इन्हें तकनीकी दृष्टि से प्राक्-मौर्य काल का माना जाता है। राजवंश राजधानी (छ.ग.) शासन अवधि मेघवंश – 1-2 शताब्दी वाकाटक नंदीवर्धन (नागपुर) 4-6वीं शताब्दी नल नागवंश कोरापुट, पुष्करी 4-12वीं शताब्दी मैकल के पाण्डव वंश अमरकंटक 5वीं शताब्दी राज्यर्षितुल्स कुलवंश आरंग 5-6वीं शताब्दी शरभपुरीय वंश शरभपुर, श्रीपुर 6वीं शताब्दी सिरपुर के पाण्डु या सोम वंश सिरपुर 6-7वीं शताब्दी पाल वंश पाली 8वीं शताब्दी कल्चुरी वंश तुम्मान, रतनपुर 1000-1757 ईफणी नाग वंश कवर्धा 10-14वीं शताब्दी छिंदकनाग वंश चक्रकोट, भ्रमरकोट 1023-1324 ईकांकेर का सोम वंश काकराय (कांकेर) 1191-1320 ईकाकतीय वंश मंधोता, बस्तर, जगदलपुर 1324-1947 ईराय पुर के कल्चुरी वंश खल्लारी, रायपुर 1420-1751 ईभोंसले वंश रतनपुर 1758-1854 ईअंग्रेज रायपुर 1854-1947 ई.▸ अशोक के कोटाडोला सिंह स्तम्भ (अम्बिकापुर के समीप) की उपस्थिति तथा रामगढ़ गुफाआें में अंकित पाली भाषा के भित्ति लेख, छत्तीसगढ़ पर अशोक के शासन की पुष्टि करते हैं।▸ मौर्यकाल के पश्चात् ओड़िशा के मेघवाहन वंश ने इसे लगभग 200 वर्षों तक अपने अधीन रखा।
▸ दक्षिण कोसल का अधिकांश भाग सातवाहनों के प्रभाव क्षेत्र में था। इनकी मुद्रा रायगढ़ जिले के 'बालपुर' नामक स्थल से प्राप्त हुई है।▸ सक्ती के निकट 'गुंजी' (ऋषभतीर्थ) से प्राप्त शिलालेख में कुमार वरदत्तश्री नामक राजा का उल्लेख है, जो संभवत: सातवाहन राजा था।▸ इसी काल का एक काष्ठस्तंभ लेख जांजगीर जिले के 'किरारी' (चन्द्रपुर) नामक स्थान से प्राप्त हुआ है।▸ प्रसिद्ध चीनी यात्री युवान-च्वांग ने उल्लेख किया है कि दक्षिण कोसल की राजधानी के निकट एक पर्वत पर साता वाहन राजा ने एक सुरंग खुदवाकर प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु नागार्जुन के लिए एक पांच मंजिला भव्य संघाराम बनवाया था।
▸ गुप्त राजा समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिण अभियान के दौरान दक्षिण कोसल (छत्तीसगढ़) के राजा महेन्द्र को पराजित किया (प्रयाग प्रशस्ति) लेकिन उसे मिलाया नहीं अपितु मात्र करद राज्य बनाकर रखा।▸ इसके पश्चात् महाकान्तर के व्याघ्रराज का उल्लेख है।▸ महेन्द्र के उत्तराधिकारियों के विषय में जानकारी नहीं मिलती, किंतु दुर्ग जिले के 'बानबरद' नामक स्थान से गुप्त मुद्राओं की प्राप्ति तथा यहाँ के अभिलेखों में गुप्त संवत् के प्रयोग से स्पष्ट है कि यहाँ गुप्तों की अधिसत्ता स्थापित हो गई थी।▸ व्याघ्रराज का संबंध संभवत: नल वंश से रहा होगा।
▸ छत्तीसगढ़ का सैंधवकाल से भी पुराना पुरातात्विक स्थल। खोज 2010 में।
▸ व्हेनसांग ने 630 ई. में बाद छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी।▸ शेष भारत की तरह ही यह समय छत्तीसगढ़ में भी राजनीतिक विघटन का था। इस समय छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में अनेक वंश आते-जाते रहे।▸ वैसे कुछ समय के लिये शरभपुर वंश के संस्थापक शरभपुर ने इसी नाम से राजधानी बनाकर राज्य को एक सूत्र में बांधा था।▸ इस समय छत्तीसगढ़ में निम्नलिखित राजवंशों का शासन रहा।▸ राजर्षितुल्य कुल, पर्वद्वारकवंश, नलवंश, शरभपुरीयवंश, सिरपुर का पाण्डूवंश (या सोमवंश), मेकल का पाण्डव वंश और बाणवंश।▸ यद्यपि इस युग के अन्तिम समय में कल्चुरी वंश का भी शासन स्थापित हो गया था, लेकिन उसका विशेष समय मध्ययुगीन है।
▸ इस वंश के 6 राजाओं ने दक्षिण कोसल में राज्य किया।▸ इसकी जानकारी इस वंश के अंतिम राजा भीमसेन द्वितीय के आरंग ताम्रपत्र (जिला-. रायपुर) से होती है।▸ ये 6 राजा थे-शूरा, दयित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दयित द्वितीय और भीमसेन द्वितीय।
▸ इस वंश के वास्तविक संस्थापक के नाम का पता नहीं चला है।▸ वस्तुत: इसके मात्र दो राजा-सोमन्नराज और तुष्टिकर की जानकारी तेराशिंघा ताम्रपत्र से मिलती है।▸ यह ताम्रपत्र राजा तुष्टिकर का है।▸ इसके अनुसार सोमन्नराज ने अपनी माता की बीमारी को दूर करने हेतु देभोक (देवभोग) गाँव दान किया था।▸ राजा तुष्टिकर ने पर्वतद्वारक गाँव दान दिया था।
▸ बस्तर-कोशपुट क्षेत्र में स्थापित नलवंश का पहला राजा वराहराज था लेकिन इसका वास्तविक संस्थापक था-मावदत्त वर्मा।▸ वराह राज की 29 स्वर्ण मुद्राये 'एडेंगा' (कोण्डागाव तहसील) से मिली है।▸ भवदत्त वर्मा के बारे में जानकारी ऋशिपुर (अमरावती) ताम्रपत्र और पोड़गढ़ शिलालेख से होती है।▸ उसने वाकाटकों से नागपुर छीन लिया था।▸ इसके समय वाकाटकों ने नागपुर पुन: प्राप्त कर लिया था।▸ इसके उत्तराधिकारी स्कंद वर्मा ने पुष्करी का पुन£नर्माण कराया।▸ विलासतुंग ने राजिम के प्रसिद्ध राजीवलोचन मंदिर का निर्माण (700–740) कराया।▸ कुलिया (दुर्ग) से प्राप्त मुद्राएं नंदनराज और स्तंभ नामक दो नल राजाओं का उल्लेख करती है।▸ 10वीं शति के मध्य में एक नल राजा मसेन भी दिखायी देता है।▸ अन्त्त: 800 वर्षों का नलराज्य 12वीं शति की शुरूआत में समाप्त हो गया।
▸ लगभग 5वीं सदी ईस्वी के अंत में दक्षिण कोसल में एक नये राजवंश की स्थापना हुई। भानुगुप्त के एरण स्तंभलेख (गुप्त संवत् 191 अथवा 510 ई.) में शरभराज का उल्लेख है, जो संभवत: शुरभपुरीय वंश का संस्थापक था। शरभ का उत्तराधिकारी नरेन्द्र था। इसके तीन ताम्रपत्र प्राप्त हुये हैं।▸ इसके पश्चात् प्रसन्नमात्र नामक एक शक्तिशाली राजा हुआ।▸ परवर्ती अभिलेखों में वंशावली इसी नरेश से प्रारंभ की गई है।▸ उसने अपने नाम से प्रसन्नपुर नामक नगर की स्थापना की थी, जो निडिला नदी के किनारे स्थित था।▸ इंद्रबल राज उसका सामंत था।▸ सुदेवराज की मृत्यु के पश्चात् वह प्रवरराज द्वितीय के काल में अवसर पाकर दक्षिण कोसल के उत्तर-पूर्वी भाग पर आधिपत्य स्थापित करके शरभपुरीय शासन को समाप्त कर स्वयं राजा बन गया और श्रीपुर के पान्डु वंश की स्थापना की।
▸ इसके अलावा उक्त अवधि में पान्डु वंश, बागवंश, सोमवंश भी यहाँ शासन करते रहे।▸ पाण्डु वंश के राजा हर्षगुप्त की विधवा वासटा ने विष्णु मंदिर बनवाया था जो अब सिरपुर के लक्ष्मण मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है।▸ इस वंश के महाशिवगुप्त (बालार्जुन) के समय सिरपुर बौद्ध धर्म का केन्द्र बन गया था।▸ सोमवंश की स्थापना राजा उदयन ने की थी।▸ सोमवंश का युग स्वर्ण युग था।
▸ पूर्व मध्ययुग में छत्तीसगढ़ पर सबसे शक्तिशाली राज्य कल्चुरियों ने स्थापित किया था।▸ कल्चुरी मुख्यत: त्रिपुरी (जबलपुर) के थे और इनके राजा शंकरगण ने पाली पर कब्जा कर छत्तीसगढ़ में कल्चुरी सत्ता स्थापित की थी।▸ बाद में कल्चुरी नरेश कलिंगराज ने पुन: छत्तीसगढ़ को जीता और तुम्माण को राजधानी बनाया था।▸ उसके वंशज रत्नदेव ने तरनपुर की स्थापना की और उसे राजधानी बनाया।▸ रतनपुर का सर्वाधिक शक्तिशाली कल्चुरी राजा जाजल्लदेव था।
▸ कल्चुरियों की एक शाखा 14वीं सदी में रायपुर स्थानान्तरित हुई जहाँ अंतिम कल्चुरी राजा अमरसिंह देव दिखायी देता है।▸ कल्चुरियों के समकालीन ही छिंदक वंश के राजा बस्तर में राज्य कर रहे थे।▸ कवर्धा में फड़ी राजवंश भी इनका समकालीन था। महमूद खिलजी (1400–41) ने छत्तीसगढ़ पर पहला मुस्लिम आक्रमण किया था।▸ इसके बाद छत्तीसगढ़ उभरती मराठा शक्ति के अधीन हुआ।▸ 1758 में रघुजी भोंसले के पुत्र बिम्बाजी छत्तीसगढ़ के प्रशासक नियुक्त हुए। उनके समय महान हल्बा क्रांति (1777–79) बस्तर में हुई।▸ 1818 तक जब भारत में मराठा शक्ति का अंत हुआ, छत्तीसगढ़ पर भोंसले सूबा पद्धति से शासन करते रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ को 8 सूबाें में बांटा था।
▸ अंग्रेजों ने चतुर्थ मराठा युद्ध में मराठों को लगभग समाप्त कर दिया था।▸ नागपुर के भोंसले ने भी परास्त होकर छत्तीसगढ़ अंग्रेजों को सौंप दिया।▸ अंग्रेजों ने इसे पहले एक जिला बनाया तथा कैप्टन एडमन्ड को यहाँ की प्रशासकीय जिम्मेदारी सौंपी।▸ कैप्टन एग्न्यु ने रतनपुर के स्थान पर रायपुर को राजधानी बनाया।▸ 1830 में रघुजी भोंसले तृतीय ने यहाँ पुन: नियंत्रण स्थापित कर लिया जो उनकी मृत्यु तक रहा।▸ 1853 में उनकी मृत्यु का लाभ उठाकर डलहौजी ने हड़प नीति के द्वारा जब पूरे भोंसले राज्य को 1853 में ब्रिटिश राज्य में मिलाया तो छत्तीसगढ़ भी ब्रिटिश शासन का हिस्सा बन गया।▸ अंग्रेजी शासन के दौरान छत्तीसगढ़ में 14 रियासतें, बस्तर, छुई खदान, कांकेर, खैरागढ़, कवर्धा, नांदगांव, रायगढ़, शक्ति, जशपुर, सारंगढ़, चांगभखार, सरगुजा, कोरिया और उदयपुर थी तथा 34 जमींदारियाँ थीं। 1857 के विद्रोह में भाग लेने के कारण सोनाखान की जमींदारी भंग कर दी गयी थी।▸ अत: बाद में 33 जमींदारियाँ रह गयी थीं।
▸ इस दौरान दूसरी तथा तीसरी नेटिव इन्फैन्ट्री ने और कुछ जमींदारों ने विद्रोह में भाग लिया था।▸ वस्तुत: 1856 से ही यहाँ विद्रोह के स्वर मुखर थे जब सोनाखान के भीषण अकाल के चलते कसडोल के साहूकार के यहाँ डकैती पड़ी और अंग्रेजों ने सोनाखान के जमींदार नारायण सिंह को इस आरोप में कैद कर लिया। नारायण सिंह भाग निकले और छापामार सेना गठित की, लेकिन अन्य जमींदारों के विश्वासघात के कारण अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर जयस्तम्भ चौक, रायपुर में सार्वजनिक फांसी दे डाली (10दिसम्बर, 1857)।▸ इन्हें वीर नारायण सिंह कहा जाता है और छत्तीसगढ़ का प्रथम शहीद भी माना जाता है।▸ 1857 में ही सतारा स्टेट के वकील रंगा बाबू ने रायपुर में अंग्रेज विरोधी बिगुल बजाया।▸ लेकिन सर्वाधिक क्रांतिकारी कार्य किया, मेंगजीन लश्कर हनुमान सिंह ने। इन्होंने तीसरी नेटीव इन्फेन्ट्री के सार्जेंट मेजर सिडवेल ही हत्या कर दी।▸ इसलिए हनुमान सिंह को छत्तीसगढ़ का मंगल पाण्डे कहा जाता है।▸ वे अंत तक अंग्रेजों के हाथ न लगे, लेकिन उनके 17 साथी सैनिकों को फांसी दे दी गई।
▸ छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय चेतना और जागरण के जनक थे पं. सुन्दरलाल शर्मा।▸ इन्होंने 1906 में संमित्र मण्डल की स्थापना के साथ ही सामाजिक सुधारों का श्रीगणेश किया और फिर राष्ट्रीय चेतना की दिशा में भी सक्रिय हो उठे।▸ उनके समकालीन ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने 1909 में सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना कर बौद्धिक जागृति लाने का प्रयास किया।▸ इसके पूर्व वे अपने सहयोगियों, श्री शिवलाल मास्टर तथा शंकर खरे के साथ मिलकर बंग-भंग के विरोध में स्वदेशी आन्दोलन का सूत्रपात छत्तीसगढ में कर चुके थे।
▸ मूलचन्द बागड़ी, माधवराव सप्रे, लक्ष्मण राव के प्रयासों से छत्तीसगढ़ में होमरूल लीग की शाखा स्थापित हुई।▸ यहीं से छत्तीसगढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष का अभिन्न हिस्सा बन गया।
▸ राजनांदगांव की बी.एन.सी. मिल के मजदूरों ने ठाकुर प्यारेलाल सिंह के मार्गदर्शन में ऐतिहासिक सफल हड़ताल अप्रैल 1920 में की जो 36 दिनों तक चली थी।▸ वी.वी. गिरि भी श्रमिकों का नेतृत्व करने राजनांदगांव आये थे।▸ ठाकुर प्यारेलाल सिंह को रियासत के अधिकारियों ने राजनांदगांव से निष्कासित करने का आदेश दिया था जिसे गर्वनर ने रद्द कर दिया।
▸ पं. सुन्दरलाल शर्मा ने नारायण रावे मेघवाले के साथ किसानों के पक्ष में यह सत्याग्रह कसडोल (जि-बालौदाबाजार) में आयोजित किया।▸ उद्देश्य था-नहर के उपयोग पर लगने वाले जल-कर को न देना। छत्तीसगढ़ में असहयोग आन्दोलन की पृष्ठभूमि इस सत्याग्रह ने तैयार कर दी।▸ महात्मा गांधी का इसी दौरान 1920 में प्रथम आगमन छत्तीसगढ़ की भूमि पर हुआ और वे धमतरी, कुरूद, रायपुर गये। किसानों पर लगाया गया कर माफ कर दिया गया।▸ गांधी जी के साथ अली बन्धु भी इस प्रवास पर आये थे। धमतरी के मंडई बन्ध चौक और रायपुर के गांधी चौक में गांधीजी की सभाएं हुई थीं।
▸ छत्तीसगढ़ में नहर और कन्डेल सत्याग्रह के माध्यम से पं. सुन्दरलाल शर्मा असहयोग का वातावरण बना चुके थे।▸ उन्होंने ही असहयोग आन्दोलन को नेतृत्व दिया। उसके साथ ही ठाकुर प्यारेलाल सिंह, ई. राघवेन्द्र राव, बैरिस्टर छेदीलाल, पं. रामनारायण तिवारी, डी. के. मेहता, पं. रविशंकर शुक्ल, पं. वामनराव लाखे आदि भी इस आन्दोलन के प्रमुख कर्णधार थे।▸ इन्होंने वकालत, उपाधियाँ आदि त्याग दी। बैरिस्टर थैकर ने विधायक पद छोड़ा तथा कुंजबिहारीलाल अग्निहोत्री ने सांसद पद से इस्तीफा दिया।▸ असहयोग आन्दोलन के अन्य नेताओं में सी. पी. ठक्कर, सेठ प्रभुलाल काबरा, माधवराव सप्रे, नारायण राव मेघवाले, लक्ष्मणराव उदीकर, नत्थुपी जगताप, दाऊ घनश्यामसिंह गुप्ता आदि प्रमुख थे।
▸ 21 जनवरी 1922 को आदिवासियों द्वारा वन विभाग के शोषण के विरूद्ध यह सत्याग्रह सिहाबा नगरी (जिलाधमतरी) में आयोजित हुआ। सुन्दरलाल शर्मा, नारायण मेघवाले ने हस्तक्षेप कर इसे स्थगित करवाया जिसमें आदिवासियों की मांगे मान ली गयीं। इसी प्रकार के जंगल सत्याग्रह राज्य के अन्य भागों में भी आयोजित हुए थे।▸ इन सत्याग्रहों में शंकरराव, गनोदवाले, यति यतनलाल, सुन्दरलाल शर्मा आदि विशेष रूप से सक्रिय थे।
▸ रायपुर में मई 1922 को जिले भर के प्रतिनिधियों का सम्मेलन आयोजित हुआ। यहाँ नि:शुल्क पास को लेकर अधिकारियों तथा कांग्रेसियों के मध्य विवाद उठा और जब स्वागत समिति के अध्यक्ष पं. रविशंकर शुक्ल को गिरफ्तार किया गया तो जनता ने थाने का घेराव किया।▸ इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी ने एक विशाल रैली को सम्बोधित किया था।
▸ महात्मा गांधी के द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक स्थगित करने से उपजे कांग्रेस के आंतरिक असंतोष का परिणाम हुआ-स्वराज्य दल।▸ छत्तीसगढ़ में भी पं. रविशंकर शुक्ल, ई. राघवेन्द्र राव तथा शिव डागा ने स्वराज्य दल की शाखा का गठन किया।▸ बाद में 1925 में ई. राघवेन्द्र राव ने पृथक होकर स्वतंत्र दल बनाया।
▸ गांधीजी के दांडी मार्च (12 मार्च-6 अप्रैल) में छत्तीसगढ़ से पं. रविशंकर शुक्ल तथा पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र भी शामिल हुए।▸ पं. शुक्ल ने रायपुर पहुँचकर नमक बनाकर इस आन्दोलन का शंखनाद छत्तीसगढ़ में किया। धमतरी में यही काम गणेश नारायण राव ने किया। यहाँ सत्याग्रह आश्रम खोला गया-स्वयं सेवकों को प्रशिक्षित करने हेतु।
▸ महासमुंद में शंकर राव गनोदवाले के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह हुआ और उन्हें यति यतनलाल के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।▸ यहाँ दयावती नामक नवयुवती ने एक अधिकारी को तमाचा जड़ा था क्योंकि वह उसे आगे नहीं जाने देना चाहता था।▸ रुद्री और बरदाटोला में भी जंगल सत्याग्रह हुऐ। रायपुर में बलिराम दुबे और यति यतनलाल द्वारा वानर सेना का गठन।▸ गांधी-इरविन समझौते के साथ ही आन्दोलन का प्रथम चरण थम गया।
▸ पं रविशंकर शुक्ल के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा का दूसरा चरण पुन: भड़क उठा। इस बार राजनीतिक कार्यक्रमों के साथ ही सामाजिक कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया जाना था।▸ पेशावर दिवस (29 जनवरी) को पं. शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, खूबचन्द बघेल, असुल रउफ, नन्दकुमार दानी पुन: जेल में ठूँस दिये गये।▸ तिरंगा फहराने के कारण धनश्याम सिंह गुप्त (दुर्ग) गिरफ्तार कर लिये गये।
▸ गांधीजी अपने कार्यक्रम हरिजनोद्धार के तहत छत्तीसगढ़ दूसरी बार आय। वे दुर्ग, धमतरी, भाटापारा, बिलासपुर, रायपुर, गये।▸ हरिजनोद्धार का पहला प्रयास तो गांधीजी के पूर्व छत्तीसगढ़ में ही पं. सुन्दरलाल शर्मा के नेतृत्व में 1917 में हो चुका था।▸ पं. शर्मा ने ही 1925 में हरिजनों के साथ राजीवलोचन मन्दिर मे प्रवेश किया था।▸ 1934 में दुर्ग में घनश्यामसिंह गुप्त की अध्यक्षता में हरिजन सेवक संघ गठित हुआ था।
▸ छत्तीसगढ़ इस समय सी.पी. बरार का हिस्सा था।▸ 1937 में प्रान्तों में चुनाव हुए और यहाँ कांग्रेसी सरकार बनी। डा. एल. पी. खरे ने नेतृत्व में पहला मंत्रिमण्डल बना लेकिन उनके इस्तीफे के बाद पं. रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री बने।▸ ई. राघवेन्द्र राव पहले गवर्नर नियुक्त हुए।▸ 1939 में सभी कांग्रेसी मंत्रिमण्डलों ने इस्तीफा दे दिया।
▸ महात्मा गांधी ने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह का आव्हान किया। विनोबा भावे पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही थे।▸ छत्तीसगढ़ के लिए यह सम्मान मिला, पं. रविशंकर शुक्ल को, जिन्होंने रायपुर में इस दौरान अपनी गिरफ्तारी से यह सत्याग्रह शुरू किया।
▸ अंग्रेजों के दमन के विरूद्ध क्रांतिकारी गतिविधियाँ भी छत्तीसगढ़ की भूमि पर आयोजित हुईं।▸ नवयुवक परसराम सोनी ने अंग्रेजों के विरूद्ध क्रांतिकारी षड़यंत्र रचा, लेकिन उसके बाल सखा शिवनन्दन ने इसका भांड़ा फोड़ दिया और सभी क्रांतिकारी कैद कर लिये गये।
▸ रायपुर जेल की दीवार को डायनामाइट से उड़ा देने की योजना बनाई थी जो डायनामाइट कांड के नाम से जाना जाता है।▸ इसमें बिलखनारायण अग्रवाल, ईश्वरीचरण शुक्ल, नागरदास बावरिया, नारायणदास राठौर, जयनारायण पाण्डेय प्रमुख थे।▸ योजना विफल रही और संबंधित सभी नेता गिरफ्तार कर लिये गये।
▸ बंबई अधिवेशन में 8 अगस्त को गांधीजी के करो या मरो के नारे से भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू हुआ। मध्य रात्रि को ही गांधीजी सहित सभी प्रमुख नेता कैद कर लिये गये।▸ छत्तीसगढ़ से इस आन्दोलन के भाग लेने पहुँच रहे पं. शुक्ल, खूबचन्द बघेल, ठाकुर छेदीलाल, महन्त लक्ष्मी नारायणदास आदि मलकापुर स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिये गये। लेकिन छत्तीसगढ़ में यह आन्दोलन रूका नहीं।▸ रामकृष्ण सिंह ठाकुर तथा वल्लभदास गुप्ता को गुप्त आंदोलन चलाने के कारण गिरफ्तार किया गया। रायपुर में जयनारायण पांडेय, कमलनारायण शर्मा, रणवीर सिंह शास्त्री, त्रेतानाथ तिवारी, बिलासपुर में राजकिशोर वर्मा, छेदीलाल सिंह, यदुनन्दन श्रीवास्तव, चिंतामणि ओनलवार तथा दुर्ग में रघुनन्दन सिंगरौल के नेतृत्व में यह आन्दोलन तीव्र हो गया।▸ दुर्ग में स्थिति अत्यन्त विस्फोटक थी। जहाँ कचहरी तथा नगरपालिका के भवनों को आग लगा दी गयी थी।▸ अंग्रेजों के भयंकर दमन ने इस आन्दोलन को भी कुचल दिया लेकिन इसने जनता को व्यापक पैमाने पर राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ जोड़ दिया।
▸ 1944 के चुनाव में कांग्रेस पुन: जीतकर आयी और पं. शुक्ल के नेतृत्व में मंत्रिमण् डल का गठन हुआ।
▸ 1945-46 के प्रांतीय विधायिकाओं के चुनाव में सी.पी. बरार में कांग्रेस को बहुमत मिला। पं. रविशंकर शुक्ल के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बनाई। धनश्याम सिंह गुप्त विधानसभा अध्यक्ष चुने गये।▸ 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इस दिन वामन राव लाखे ने गांधी चौक रायपुर में ध्वज फहराया एवं शासन की ओर से जयस्तंभ की नींव रखी गई।▸ स्वतंत्रता के समय छत्तीसगढ़ सी.पी खंड बरार का भाग था। 1948 में छत्तीसगढ़ क्षेत्र की 14 रियासतों का विलय भारत में हुआ।
▸ ब्लंट को जमींदारी के राजा के यहाँ पहँुचना था, किन्तु गोंडो ने कैप्टन ब्लंट को इन्द्रावति पार भोपालपटन्ट म जाने से रोकने हेतु हमला बोला। ब्लंट को वापस आना पड़ा।
▸ बस्तर राज्य के उत्तर-पश्चिम में स्थित परलकोट सबसे पुरानी जमींदारी थी। 1824ई. में गेंद सिंह इस जमींदारी का जमींदार था।▸ इन दिनों महिपालदेव बस्तर का राजा था। परलकोट में मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों की उपस्थिति से अबुझमाड़ियों को अपनी पहचान का खतरा उत्पन्न हो गया था।▸ परलकोट विद्रोह की शुरूआत इनको बाहर भगाने के लक्ष्य से हुई थी।▸ गेंद सिंह के आहवान पर अबूझ माड़िया आदिवासी 24 दिसम्बर 1824 को परलकोट में एकत्रित होने लगे।▸ क्रांतिकारी धावड़ा-वृक्ष की टहनियों को विद्रोह के संकेत के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते थे।▸ गेंद सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। 20 जनवरी, 1825 को गेंद सिंह को उसके महल के सामने अंग्रेजों ने फांसी दे दी।
▸ बस्तर राज्य के राजा भूपालसिंह देव के समय तारापुर परगना का प्रशासक दलगंजन सिंह था जो प्रजा भक्त था।▸ नागपुर सरकार के आदेश पर राजा ने तारापुर परगने का कर बढ़ाया तो दलगंजन सिंह ने आदिवासियों के साथ मिलकर इसका विरोध किया।▸ उन्होंने दीवान जगबंधु को हटाने और कर वापस लेने की मांग रखी।
▸ दंतेवाड़ा में स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में नरबलि (जिसे मेरियो कहा जाता था) जैसी जघन्य प्रथा प्रचलित थी। बस्तर के राजा भूपालदेव ने ब्रिटिश सरकार के आदेश पर इसे रोकने की कोशिश की।▸ नागपुर से एक सैन्य टुकड़ी 1842 से 1863 तक यहाँ तैनात रखी गयी।▸ आदिवासियों ने इस सब को अपने आन्तरिक मामलों मे हस्तक्षेप माना और हिडमा मांझी के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया।▸ अंग्रेज मेरिया विद्रोह को दबाने में सफल रहे।
▸ 1854 में नागपुर को ब्रिटिश राज्य में मिलाये जाने से उसके अधीन रहा बस्तर भी ब्रिटिश राज्य में मिल गया। अंग्रेजों ने बस्तर का हर तरह से शोषण किया।▸ ऐसे समय लिंगागिरी तालुके के तालुकेदार धुर्वाराव ने माड़िया और दोर्ला आदिवासियों को संगठित कर अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र मुक्ति संग्राम छेड़ दिया।▸ 3 मार्च, 1856 को चितलवार की लड़ाई में अंग्रेजों ने विद्रोह कुचल दिया। धुर्वाराव को फांसी हुई।
▸ यह विद्रोह (1774 –77) बस्तर के उत्तराधिकारी संघर्ष का परिणाम था।▸ राजा दलपत देव की मृत्यु के बाद उनके पुत्र अजमेर सिंह ने बड़े भाई दरियायदेव को परास्त कर राज्य प्राप्त कर लिया।▸ दरियायदेव ने अंग्रेजों, जयपुर और नागपुर से संधि कर अजमेर सिंह से राज्य छीन लिया।▸ लेकिन लेाकप्रिय अजमेर सिंह ने हल्बाओं के साथ मिलकर दरियायदेव को शीघ्र अपदस्थ कर दिया।▸ दरियायदेव ने जयपुर राज्य और भोंसले से पुन: संधि की और अजमेर सिंह को अपदस्थ कर दिया।▸ डोंगर के भीबण युद्ध में न सिर्फ अजमेर सिंह मारा गया अपितु हल्बाओं का भीषण रक्तपात किया गया।
▸ कोई अर्थात वन बहुल पहाड़ी क्षेत्रों के आदिवासी।▸ फोतकेल के जमींदार नागुल दोरला ने भोपालपटन्ट म के जमींदार राम भाई और भेजी के जमींदार जुग्गाराजू को अपने पक्ष में कर अंग्रेजों द्वारा साल वृक्षों के काटे जाने के खिलाफ 1859 ई. में विद्रोह कर दिया।▸ आन्दोलनकारियों ने एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर का नारा दिया। इस जन आंदोलन से हैदराबाद का निजाम और अंग्रेज घबरा उठे।▸ अंत्त: बाध्य होकर निजाम और अंग्रेजों ने नागुल दोरला और उसके साथियों के साथ समझौता किया।
▸ बस्तर के आदिवासी विद्रोहों में 1876 का मुरिया विद्रोह काफी व्यापक और दुरगामी प्रभाव का माना जाता है।▸ अंग्रेजों ने आदिवासियों की व्यापारिक फसलों पर अधिकार के बाद 1864 में नये भूमि कानून लागू किये।▸ उधर राजा भेरमदेव के दीवान गोपीनाथ के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे।▸ जनवरी 1876 में मुरियाओं ने भेरमदेव को प्रिंस आफ वेल्स को सलामी देने बम्बई जाने से रोका ताकि दीवान अत्याचार न कर सके।▸ दीवान ने मुरियाओं पर गोली चलवा दी।▸ अब 'झाड़ा सिरहा' के नेतृत्व में आदिवासियों ने 2 मार्च 1876 को जगदलपुर महल को घेर लिया गया लेकिन एन वक्त पर अंगे्रजी सेना आ धमकी और विद्रोह कुचल दिया गया।▸ परन्तु ब्रिटिश सरकार ने जांच में राजा दीवान, और कर्मचारियों को दोषी ठहराया तथा अनेक प्रशासनिक सुधार लागू किये।
▸ भूमकाल अर्थात भूमि का कंपन। 1 फरवरी से 29 मार्च 1910 के बीच बस्तर की भूमि एक महान विद्रोह द्वारा कांप उठी।▸ लाल कालेन्द्र सिंह और राजमाता कैद कर लिये गये, आदिवासियों को गिरफ्तार कर अनेक दिनों तक कोडे लगाये गये लेकिन वीर गुंडाधुर का पता अंग्रेजों को कभी नहीं लग पाया। छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ रतनपुरा शाखा के अन्तर्गत रायपुर शाखा के अन्तर्गत रतनपुर पाटन खरौद सिंगारपुर विजयपुर ओमेरा नवागढ़ सारधा कोटगढ़ लवन पंडरभटा्ट (पंडरभठा) मेंहदी सेमरिया सिरपुर लाफा सिंघनगढ़ मातिन सुक्रमार उपरोड़ा अकलतरा करकटी्ट -कंड्री रायपुर मारो लवन सोंधी दुर्ग ओखरगढ़ सिरसा चांपा फिगेश्वर केण्दा राजिम पेंड्रा (पेंडरा) टैगनागढ़ मदनपुर (चाम्पा) खल्लारा छत्तीसगढ़ की रियासतें क्र.स. रियासत जिला1. सारंगढ़ रायगढ़2. सरगुज सरगुजा3. रायगढ़ रायगढ़4. कोरिया कोरिया5. सक्ती (सबसे छोटी रियासत) जांज गीर6. छुईखदान राजनांदगांव7. कवर्धा कबीरधाम8. जशपुर जशपुर9. चांगभखार कोरिया10. उदयपुर (धरमजयगढ़) रायगढ़11. राजनांदगांव राजनांदगांव12. खैरागढ़ राजनांदगांव13. बस्तर (सबसे बड़ी रियासत) बस्तर14. कांकेर कांकेर छत्तीसगढ़ क्षेत्र की जमींदारियाँ1. देवरी 2. फिंगेश्वा3. खरियार 4. भटगाँव5. फुलझर 6. गंडई7. सिल्हेटी 8. सहसपुर लोहारा9. कोरच 10. पाना-बरस11. पेण्ड्रा 12. मातीन13. छुरी 14. चाम्पा15. पण्डरिया 16. सोनाखान (भंग-1857)17. कौंडिया (पिथौरा) 18. नर्रा19. सुअरभार 20. बिन्द्रानवागढ़21. कटगी 22. विलाईगढ़23. परपोड़ी 24. ठाकुर टोला25. बरबसपुर 26. गुण्डरदेही27. खुज्जी 28. डौंडी लोहारा29. अम्बागढ़ चौकी 30. औंधी31. मातीन 32. केंदा33. उपरोड़ा 34. कोरबा35. लाफा
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