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Study Guide: ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थल (Chhattisgarh GK in Hindi - Historical & Arcaheogical Sites)
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ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक स्थल (Chhattisgarh GK in Hindi - Historical & Arcaheogical Sites)

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रायपुर

v यह नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी है। प्राप्त अभिलेखों एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह ज्ञात होता है कि रायपुर ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल था।
v पाँचवी सदी में पांडूवंश ने यहाँ अपना प्रभुत्व स्थापित किया था।
v इस वंश की सत्ता समाप्त होने के पश्चात्‌ रतनपुर स्थित कल्चुरी के एक लहुरी शाखा ने अपनी आधिपत्य की स्थापना की थी।
v लगभग 700 वर्षों तक हैदयवंशी कल्चुरी यहाँ शासन करते रहे।
v इसका निर्माण राजा जैतसिंह के समय हुआ था।
v इसी प्रकार पुरानी बस्ती रायपुर में स्थित अनेक मन्दिर जैसे शीतलामाता मन्दिर, महामाया मन्दिर, बुढ़ेश्वर महादेव मन्दिर सभी प्राचीन एवं ऐतिहासिक है।
v प्रथम मराठा शाक बिम्बाजी थे, उन्होंने 1775 में बुढ़ा तालाब के किनारे भगवान रामचन्द्र का मन्दिर बनाया था, जो आज भी स्थित है। सन्‌ 1818 में नागपुर व उसके अधिनस्थ भू-भागों पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। इसी समय रायपुर में भी अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हुआ।
v अंग्रेजों ने रायपुर को विकसित व आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न किया।
राजिम
v राजिम महानयी, पैरी व सोंढुर के संगम पर बसी एक प्राचीन नगरी है। इसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है।
v राजिम का प्राचीन नाम 'कमल क्षेत्र' पदमपुर व देवपुर ज्ञात होता है। यहाँ पर कुलेश्वर महादेव मन्दिर, राजेश्वर मन्दिर, राजीव लोचन मन्दिर है। इसका निर्माण लगभग 5वीं सदी में हुआ था। नलवंशीय शासक विलातुंग एवं कलचुरी शासक जाज्जवल्यदेव प्रथम के समय इस मन्दिर का जीर्णोद्वारा किया गया था।
v इस मन्दिर के भित्ति पर संवत्‌ 896 यानी सन्‌ 1145 का एक शिलालेख लगा हुआ है। उससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि जाज्जवल्यदेव प्रथम के सेनापति जगपाल ने मन्दिर का जीर्णोद्वार किया था।

आरंग

v आरंग एक प्राचीन नगरी थी। इसकी प्राचीनतम वहाँ पर स्थित तालाबों, मन्दिरों, प्राप्त ताम्रपात्रों, अभिलेखीय साक्ष्यों से होती है। आरंग महाभारत कालीन राजा मोरध्वज की नगरी थी।
v यहाँ पर अनेक प्राचीनतम मन्दिर स्थित है।
v इसमें भांडदेवल मन्दिर, बाघ देवल मन्दिर महामाया मन्दिर मुख्य है। भांडदेवल मन्दिर का निर्माण 11वीं सदी में हुआ था।

सिरपुर

v महानदी के तट पर स्थित यह स्थल छत्तीसगढ़ का प्राचीनतम नगर एवं राजधानी थी।
v महाभारत काल में इसका चिनागढ़पुर था। ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में 'श्रीपुर' कहा जाता था।
v सातवीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत आया उस समय उसने सम्पूर्ण भारत की यात्रा की। घूमते हुए वह 'श्रीपुर' आया।
v तत्कालीन समय में पाण्डुवंश शासन कर रहा था। उसकी माता वसाटा ने अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में लक्ष्मण मन्दिर बनवाया। ईटों से निर्मित यह मन्दिर विश्व प्रसिद्ध है।
v इनमें गंधेश्वर मन्दिर, राधाकृष्णा मन्दिर, चण्डी मन्दिर, आनन्दप्रभु कुटीर विहार प्रमुख रूप से है।

चम्पारण्य

v चम्पारण्य रायपुर के दक्षिण पूर्व भाग में स्थित ऐतिहासिक महत्त्व का स्थल है।
v उनका जन्म वैशाख वदी 11 सम्वत्‌ 1335 विक्रम सम्वत्‌ को हुआ था।
v बीसवीं सदी में उनके अनुयायियों ने वल्लभाचार्य जी का एक प्रसिद्ध मन्दिर बनवाया।
v यह मन्दिर छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध है। प्रतिवर्ष जनवरी फरवरी में यहाँ मेला लगता है।
v यहाँ पर चम्पकेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है।

खाल्लरी

v इसका प्राचीन नाम खल्लवाटिका थी। रायपुर के कलचुरी शासक ब्रह्मदेव के कार्यकाल में देवपाल नामक एक मोची ने नारायण मन्दिर का निर्माण करवाया था।
v उक्त शिलालेख की रचना पडिंत दामोदर मिश्र ने की थी। यहाँ पर अनेक मन्दिरों के अवशेष हैं।
v यहाँ खल्लारी देवी का प्रसिद्ध मन्दिर ऊँचे टीले पर स्थित है।

गिरौदपुरी

v यह स्थल महानदी तट के उत्तर पश्चिम में 20 किमी. दूर स्थित है।
v यह वह तीर्थ स्थल है, जहाँ सतनामी समाज की करोड़ों भावनाएँ जुड़ी हुई है।
v देश-विदेश के सभी सतनामी समाज की पुण्य स्थली गिरौद धाम संत गुरूघासीदास का सिद्ध स्थल है।
v प्रति वर्ष 18 दिसम्बर को यहाँ पर सतनामियों का भव्य मेला आयोजित होता है।

पाटन

v यहाँ पर उत्खनन से कलचुरी कालीन अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
v सन्‌ 1995 में यहाँ के एक व्यक्ति को नींव की खुदाई करते समय 126 नग चाँदी के सिक्के प्राप्त हुए थे।
v ये सिक्के किस काल व किस शासक के हैं यह अभी तक अज्ञात है।

दामाखेड़ा

v यह कबीर पंथियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी से पूर्णिमा तक 'संत समागम मेला' का आयोजन किया जाता है।
v जिसमें विद्वान्‌ श्रद्धालु और भद्र लोग आते हैं और गुरु के चरणों में श्रद्धा अ£पत करते हैं।

धमधा

v धमधा में गोंड जमीदारी थी। यहाँ पर अनेक पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक अवशेष विद्यमान है।
v ऐसी किंवदन्ती है कि वीर गोंड सांड ने धमधा बस्ती बसाई एवं सम्वत्‌ 1300 में यहाँ पर एक किले का निर्माण किया था।
v किले का भग्रावशेष, सिंहद्वारा विद्यमान है। धमधा नगर में कई तालाब व मन्दिर विद्यमान हैं।
v यहाँ के मन्दिरों व तालाबों की अधिक संख्या यहाँ की प्राचीनता एवं ऐतिहासिकता को प्रमाणित करती है। यहाँ पर त्रिमूर्ति महामाया देवी का सिद्ध मन्दिर है।
v वर्तमान में यहाँ 30—35 मन्दिर है जिनमें महामाया, शीतला, बूढ़ादेव, शिव मन्दिर, हनुमान मन्दिर आदि प्राचीन है। इस नगर में 126 तालाब हैं।

भोरमदेव

v यह वर्तमान कबीरधाम जिले में जिला मुख्यालय से 18 किमी उत्तर पश्चिमी में स्थित एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।
v प्राचीन काल में यहाँ पर नागवंश का शासन था।
v यहाँ का भोरमदेव मन्दिर अपनी उत्कृष्ट शिल्प व मान्यता की दृष्टि से छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्राचीन मन्दिरों में से एक है, जिसे छत्तीसगढ़ का खजुराहों कहा जाता है।
v इस मन्दिर का निर्माण सन्‌ 1089 (सम्वत्‌ 840) में राजा गोपाल देव ने कराया था।
v इस मन्दिर के बाहरी दीवारों पर मैथुन मूर्तियाँ, हाथी, घोड़े, नृत्यरत स्त्री-पुरुष, गणेश, नटराज आदि की मूर्तियाँ स्थित है। भोरमदेव मन्दिर से कुछ दूरी पर मंडवामहल स्थित है, जो खण्डित स्थिति में है।
v यहाँ प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस मड़वा महल का निमार्ण्ा 14वीं शताब्दी में हुआ था। नागवंश के राजा रामचन्द्र ने हैहयवंशी राजकुमारी अबिम्कादेवी से विवाह किया था। इसी समय इस महल का निर्माण किया गया प्रतीत होता है।
v इस मन्दिर की वासनोत्तेजक मूर्तियाँ बहुत सुन्दर है।
v इसके बाहरी दीवारों पर 54 प्रेम सम्बन्धी मूर्तियाँ विभिन्न मुद्रा में है।

तुरतुरिया

v चटानों की दरार से निरन्तर तुरतुर की आवाज के साथ पानी निकलने के कारण इसे तुरतुरिया कहा जाता है।
v यहाँ बौद्ध विहार के अवशेष, प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
v ऐसा माना जाता है कि यहाँ पर बाल्मिकी ऋषि का आश्रम था यहीं लव-कुश का जन्म हुआ था।

रतनपुर

v रतनपुर छत्तीसगढ़ का धार्मिक व ऐतिहासिक महत्त्व का प्रमुख स्थल है।
v रतनपुर की स्थापना कलचुरी शासक रत्नदेव प्रथम ने की थी। उसने तुम्माण के स्थान पर इसे ही राजधानी बनाया था। रतनपुर के कलचुरी शासक रत्नदेव प्रथम, पृथ्वीदेव प्रथम, आदि ने रतनपुर की सौन्दर्यता में वृद्धि व यहाँ के विकास के लिए कई निर्माणात्मक कार्य किए, अनेक तालाबों, मन्दिरों का निर्माण करवाया। महामाया मन्दिर, कंठीदेवल मन्दिर, बुद्धेश्वर महादेव, भैरव मन्दिर, हनुमान मन्दिर सभी कलचुरी कालीन है।
v गोपाल मिश्र, माखन मिश्र, बाबू रेवाराम, शंकरदत्त मिश्र, यहाँ के पुराने साहित्यकार थे।

मल्हार

v मल्हार, बिलासपुर जिले में स्थित एक बड़ा गाँव है। इस स्थान में प्राप्त मूर्तियों, मन्दिरों, भग्रवशेषों, तालाबों से इसकी प्राचीनता व ऐतिहासिकता स्पष्ट होती है।
v इस ग्राम में मिटी से बना एक किला है जो चारों ओर खाई से घिरा है।
v सबसे पुराने अवशेषों में, एक पाषाण मूर्ति और चतुर्भुजी विष्णु की प्रतिमा प्राप्त हुई है।
v यहाँ पर कई मन्दिरों के अवशेष मिले हैं, जिसमें सर्वाधिक प्रसिद्ध पातालेश्वर केदार मन्दिर है। दूसरा महत्त्वपूर्ण मन्दिर डिन्डेश्वरी देवी का है, जो मूर्ति काले ग्रेनाईट पत्थर की है।
v इस मूर्ति का निर्माण 11वीं सदी में हुआ था। मल्हार में प्राप्त मूर्तियाँ, प्राचीन, मन्दिर, तालाब, किला, अभिलेखीय साक्ष्य इत्यादि यह प्रमाणित करता है कि वर्तमान मल्हार प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ का प्रमुख नगर था।
v के.डी. वाजपेयी ने माना है कि महेन्द्र वही शासक है जो समुन्द्रगुप्त के इलाहाबाद प्रस्सती में उल्लेखित है। इसे कौशल का राजा बताया गया है जो समुन्द्रगुप्त के हाथों हारा था और फिर से यहाँ का राजा बहाल किया गया था।

खरौद

v लक्ष्मणेश्वर मन्दिर में कलचुरी शासक रत्नदेव द्वितीय का चेदि सम्वत्‌ 933 अर्थात्‌
1181—82 ई. का शिलालेख है।
v इसमें कलिगंराज से लेकर रत्नदेव तृतीय तक की वंशावली दी गई है।
v यह मन्दिर कालचुरि काल से पूर्व का प्रतीत होता है। इसी मन्दिर में एक और शिलालेख प्राप्त हुआ है।
v जिसमें इन्द्रवल और उसके पुत्र ईशान वर्मन का नाम अंकित है।
जांजगीर
v वर्तमान में जांजगीर, चाम्पा-जांजगीर जिला का मुख्यालय है।
v अंग्रेजी शासन काल में सन्‌ 1902 में जांजगीर को तहसील बनाया गया था।
v जांजगीर एक ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक नगरी है।
v इसकी स्थापना कलचुरी शासक जाज्ज्वल्य देव प्रथम ने की थी। यहाँ उसने आम्रवन, तालाब व मन्दिर का निर्माण करवाया था।
v जांजगीर का विष्णु मन्दिर जाज्जवल्य देव के काल में 11वीं-12वीं शताब्दी में निर्मित किया गया था। जिसे स्थानीय निवासी भीमा मन्दिर या नकटा मन्दिर कहते हैं। मन्दिर की बाहरी दीवार पर विष्णु, सूर्य, शिव, देवियाँ, अष्ट दिकपाल, मैथुन प्रतिमा, अप्सरा की मूर्ति अंकित है।

अड़भार

v अड़भार जांजगीर-चांपा जिला का महत्त्वपूर्ण प्राचीन स्थल है। यहाँ पर कई पुराने तालाब तथा चारो ओर खाईयों से घिरे पुराने किले के अवशेष विद्यमान हैं।
v अड़भार में बौद्ध, जैन धर्म से सम्बन्धित अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। इसका प्राचीन नाम 'अष्टद्वारा' था यहाँ पर अष्टदेवी महिषमर्दिनी का मन्दिर है।
v एक शिलालेख में महाश्रमण तथा केशरी का उल्लेख है।

शिवरीनारायण

v शिवरीनायरायण, जांजगीर-चाम्पा जिले में स्थित एक बड़ा गाँव है।
v इस स्थान में प्राप्त मूर्तियों, मन्दिरों, भग्रवशेषों, तालाबों से इसकी प्राचीनता व ऐतिहासिकता स्पष्ट होती है।
v इस ग्राम में अनेक ऐतिहासिक मन्दिर हैं।
v यहाँ पर ई.पू. आठवीं से बारहवीं शताब्दी ई. के तक के काल की आकर्षक मूर्तियाँ भी है।
v सबसे पुराने अवशेषों में, एक पाषाण मूर्ति और विष्णु की प्रतिमा प्राप्त हुई है।
v यहाँ पर कई मन्दिरों के अवशेष भी मिले हैं। प्राप्त अभिलेखीय साक्ष्यों में इसका प्राचीन नाम 'शबरी नारायण' के नाम से ज्ञात होता है।

गतौरा

v बिलासपुर नगर के समीप गतौरा में सन्‌ 1973-74 में अनेक प्राचीन मूर्तियाँ, पुराने मन्दिर के स्थान प्राप्त हुए थे।
v यहाँ मिले अवशेषों से ऐसा प्रतीत होता है
v कि यह एक प्राचीन गाँव है। यहाँ पर एक अनेक तालाब भी मौजूद हैं।

अकलतरा

v रतनपुर के हैहय वंशीय पृथ्वीदेव द्वितीय के छोटे भाई अकलदेव ने सम्भवत: इसकी स्थापना की होगी।
v अकलदेव के नाम का उल्लेख एक शिलालेख में मिलता है।
v यह शिलालेख अकलतरा से 3 किमी. दूर स्थित महमदपुर गाँव से प्राप्त किया गया था।

कुदूरमाल

v यह कबीरपंथियों का तीर्थ स्थल है। यहाँ पर कबीर पंथ के प्रथम महंत धरमदास के पुत्र खुड़ामन की समाधि है।
v यहाँ पर प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के समय कबीरपंथियों का मेला लगता है।

पाली

v वर्तमान कोरबा जिले में पाली स्थित है। इस ग्राम में उत्तर-पूर्व में लम्बा-चौड़ा तालाब है।
v जिसके किनारे अनेक मन्दिरों के अवशेष है। एक मन्दिर को छोड़कर शेष सभी मन्दिर खण्डहर हो गए हैं।
v पाली में स्थित प्रसिद्ध मन्दिर भगवान शिव का मन्दिर है।
v इस मन्दिर का निर्माण वाणवंश के किसी शासक के शासनकाल में हुआ था। जिसका जीर्णोद्वारा 11वीं शताब्दी में जाज्ज्वल्य देव ने कराया था।

लाफागढ़

v लाफागढ़ एक ऐतिहासिक एवं प्राकृति सौन्दर्यता से परिपूर्ण स्थल है।
v यहाँ की पहाड़ी पर चतुरगढ़ का किला है।
v इस किले के द्वार, मन्दिर, मूर्तियों, डिंडाद्वार मनका दृष्टि द्वार, महिषासुर का वध करती हुई दुर्गा की मूर्ति, प्राकृतिक गुफा ऐतिहासिक एवं दर्शनीय है।

किरारी

v सन्‌ 1921 में चन्द्रपुर इलाके के ग्राम किरारी में तालाब की खुदाई के दौरान एक कृषक को लकड़ी का स्तम्भ प्राप्त हुआ।
v यह काष्ठ स्तम्भ साल लकड़ी का है।
v इसमें ब्राह्मी लिपि में लेख अंकित है। इस लिपि को पठन करने वाले डॉ. हीरानन्द शास्त्री, पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय का अनुमान है।
v कि यह काष्ठ का स्तम्भ है जो आज से 1800 वर्ष पहले किसी महाशक्तिशाली एवं प्रतापी राजा ने महानदी का तटी भूमि पर एक महायज्ञ अनुष्ठान किया था। ऐसा बताता है।

अमोदा

v यह जांजगीर-चाम्पा जिला का एक ऐतिहासिक गाँव है। इस ग्राम से सन्‌ 1924 में घर की नींव खुदाई करते समय रतनपुर के कलचुरी शासकों के तीन ताम्रपत्र शासकों के लेख प्राप्त हुए।
v ये ताम्रपत्र पृथ्वीदेव द्वितीय एवं जाजल्लदेव द्वितीय के कार्यकाल में लिखे गए थे।
v पृथ्वीदेव प्रथम के ताम्रपत्र लेख में तुम्माण में बंकेश्वर मन्दिर निर्मित कराने व ग्राम दान में दिए जाने का उल्लेख है।

कोटगढ़

v अकलतरा के समीप स्थित कोटगढ़ प्राचीनकालीन एक प्रमुख गढ़ है।
v यहाँ पर पृथ्वी देव द्वितीय का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। इसमें मन्त्री बल्लभराज के धार्मिक कार्यों का विवरण है।
v इस अभिलेखीय साक्ष्य से ज्ञात होता है। कि उसने बल्लभ सागर तालाब का निर्माण तथा शिव एवं रेवन्त के मन्दिरों का निर्माण करवाया था।

सेमरसल

v बिलासपुर जिले में सेमरसल ग्राम स्थित है। यह गाँव भी एक ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्त्व का स्थल था।
v यहाँ पर एक शिलालेख पाली लिपि में मिला है।
v उसकी प्रथम पंक्ति 'सिद्धिस्तु' शुद्ध संस्कृत में हैं शेष भाग पाली या प्राकृत में लिखा गया है। पुरातत्व विद पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय का अनुमान है कि 24 गाँव की सहायता के लिए यहाँ (सेमरसाल) उक्त अक्ष्य निधि (द्रव्यकोष) की स्थापना की गई थी।

बारसूर

v यह बस्तर जिले में पुरातत्विक महत्त्व का स्थल है। यहाँ 11वीं शताब्दी के देवरली मन्दिर, चन्द्रदिव्य मन्दिर, मामाभांजा मन्दिर, बत्तीस मन्दिर स्थित है।
v बारसूर में बारह स्तम्भ पर स्थित शिव जी का मन्दिर, गणेश की विशालकाय प्रतिमा दर्शनीय है।
v जैसा नाम वर्णन करता है, यह मन्दिर गणेश भगवान की है। यहाँ पर गणेश की दो कलायुक्त मूर्ति हैं।

मामा-भांजा मन्दिर

v यह मन्दिर भगवान गणेश को समर्पित है। लेकिन यह मामा-भांजा मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। पौराणिक कथा के अनुसार मामा-भांजा को सजा दी गई थी कि वे यह मन्दिर एक दिन में निर्मित करेंगे नहीं तो एक-दूसरे को मार देंगे मगर उन्होंने इस मन्दिर का निर्माण एक दिन में पूरा कर दिया और इस प्रकार इस मन्दिर का नाम मामा-भांजा पड़ गया।

चन्द्रादित्य मन्दिर

v यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मन्दिर एक सुन्दर तालाब के किनारे स्थित है।
v इस मन्दिर के बाहरी दीवारों पर सुन्दर मूर्तियाँ ऊकेरी गई हैं।
v दीवारों की चोटियों पर देवी-देवताओं के विभिन्न चित्र बनाए गये हैं और खांचे पर कामोत्तेजक मूर्तियाँ बनाई गई हैं।

दन्तेवाड़ा

v बस्तर में लम्बी अवधि तक नागावंश का शासन रहा है। दन्तेवाड़ा में नागवंशीय शासकों ने अपनी इष्ट देवी मणिकेशरी देवी का मन्दिर स्थापित किया था, यह मन्दिर आज भी स्थित है।
v बस्तर में राजवंश की आस्था दंतेश्वरी माई का प्रसिद्ध मन्दिर है।
v इसके अतिरिक्त यहाँ और भी अनेक मन्दिरों के भग्नावशेष दिखाई पड़ते हैं।

बत्तीसा मन्दिर

v इस मन्दिर में 32 खम्भे है। जो चार पंक्ति और आठ स्तम्भ में है।
v इन खम्भों की समरूपता दार्शनीय है।
v यहाँ पर एक मन्दिर में दो गर्भ गृह है और प्रत्येक गर्भगृह में शिव लिंग स्थापित है।
v यह मन्दिर निर्माण का कलात्मक उदाहरण है।

जतनपाल व कुरुसपास

v ये दोनों बस्तर क्षेत्र में स्थित है। ऐतिहासिक दृष्टि से इन दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जतनपाल के निकट सन्‌ 1218 ई. का एक अभिलेख मिला है जिसमें नरसिंह देव द्वारा भूमिदान दिए जाने का उल्लेख है। इसी प्रकार कुरुधपाल में सन्‌ 1907 ई. का एक लेख प्राप्त हुआ है। जिसमें कलचुरी राज्य के रतनपुर का उल्लेख है।

रामगढ़

v यह स्थान अम्बिकापुर के पास स्थित सुन्दर, सुरम्य वनों और पहाड़ों से घिरा हुआ है।
v रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित मन्दिर, गुफाएँ एवं भित्ति चित्र ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है।
v ऐसी किंवदन्ती है कि भगवान राम, पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास काल का कुछ समय इसी स्थल पर बिताए थे।
v राम के निवास के कारण ही यह स्थल रामगढ़ कहा जाता है।
v रामगढ़ की पहाड़ी पर स्थित अनेक मन्दिरों के खण्डहर, गुफाएँ तथा अनेक दर्शनीय मूर्तियाँ हैं।
v पहाड़ी के शिखर पर मौर्य कालीन गुफाएँ हैं। इनमें सीमा मोंगरा, जोगीमार गुफा, लक्ष्मण ओंगरा, विशिष्ट गुफा मुख्य है।
v गुफा पर अंकित लेख से ये जानकारी प्राप्त होती है कि सुतनुका देवदासी यहाँ निवास करती थी।
v उसी ने नृत्यांगनाओं के विश्राम के लिए इसे बनवाया था। रामगढ़ पर्वत और उसकी गुफाएँ, मन्दिर के भग्नावशेष दर्शनीय है।

डीपाडीह

v स्थानीय भाषा में 'डिपाडीह' का नाम पवित्र भूमि है।
v पुरातात्विक स्थल जैसे सामन्त सरना, उखटोला, रानी पोखरा और चामुण्डा मन्दिर में खोजे गए मन्दिर मुख्य रूप से शिव को समर्पित है।
v ये 6वीं से 10वीं शताब्दी के दिनांकित है। डीपाडीह सरगुजा जिला में स्थित है।
v सन्‌ 1988 में इस स्थल पर पुरातत्व विभाग ने उत्खनन कराया।

नेतनगर

v रायगढ़ जिले में स्थित नेतनगर एक प्राचीन स्थल था। यहाँ की पहाड़ी पर ऊपर खड़ी चटा्टनों पर आदिम मानव के द्वारा चित्रित विभिन्न चित्र अंकित हैं।
v सिंघनपुर के चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय बंगाल नागपुर रेलवे के डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर सी.डब्ल्यू.एडर्सन को है।

पुजारीपाली

v सरिया के निकट पुजारीपाली ग्राम स्थित है।
v यहाँ पर जैन धर्म और हिन्दू धर्म से सम्बन्धित देवी-देवताओं की मूर्ति प्राप्त हुई हैं।
v पुजारी पाली गाँव में एक प्राचीन मन्दिर का अवशेष है जिसे लोग केंवटिन मन्दिर कहते हैं।
v इस मन्दिर में एक शिलालेख है जो 12वीं सदी का है। इसकी लिपि नागरी है।
v यह शिलालेख वर्तमान में महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय रायपुर में सुरक्षित है।

बसनाझर

v रायगढ़ जिले के खरसिया नगर के समीप स्थित है।
v यहाँ पर महत्त्वपूर्ण शैलाश्रय प्राप्त हुआ है।
v गेरूए रंग से अंकित चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय पुरातत्वविद्‌ प¯डत लोचनप्रसाद पाण्डेय को है।
v यहाँ पर अनेक चित्र चित्रांकित किए गए हैं।
v चित्रों की संख्या लगभग 400 है।

कबरा

v कबरा में स्थित पहाड़ पर शैलाश्रय विद्यमान हैं।
v यह स्थल रायगढ़ नगर से 8 किमी. दूर स्थित है।
v इन शैलाश्रय के चित्र सिंघनपुर के चित्रों की अपेक्षा अधिक रोचक व महत्त्वपूर्ण हैं।
v इनमें से एक सूर्य, बिम्ब एक वृहद आकार के सुअर तथा छिपकली नुमा कुछ सरीसृप जन्तु की आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं।

बहानदेई

v यह सारंगगढ़ के समीप पहाड़ी स्थित है।
v इस पहाड़ी में शैलाश्रय प्राप्त हुआ है। यह एक ऊँची पहाड़ी पर आदि मानवों द्वारा प्राकृतिक रंगों के उपयोग से हिरन, मनुष्य, मगरमच्छ, जाल, शेर आदि चित्र बनाए हैं।
v यह चित्र सैकड़ों वर्षों से उसी रंगरूप में विद्यमान हैं।

ओंगना

v धर्मजयगढ़ तहसील में स्थित ओंगना ग्राम के निकटस्थ पहाड़ी पर आदिम मानवों के चित्रित शैलाश्रय में गहरे और हल्के गेरूए में शैलचित्र अंकित है।
v इसमें शिकार दृश्य, नृत्य, बैल, गाय चित्रांकित किए गए हैं।

गाताडीह

v सारंगढ़ तहसील में गाताडीह गाँव स्थित है।
v यहाँ पर स्थित पहाड़ी में शैलाश्रय प्राप्त है।
v जिसमें मगरमच्छ, भैंस, ताल आदि के चित्र मुख्य रूप से अंकित हैं।
v यह आदिम मानवों द्वारा चित्रित किया गया है।

करमागढ़

v रायगढ़ से 30 किमी. की दूरी पर उड़ीसा राज्य की सीमा पर करमागढ़ शैलाश्रय है।
v इस शैलाश्रय में लगभग 3000 से अधिक आकृतियाँ चित्रांकित की गई हैं।
v ये सभी चित्र गैरिक रंग में हैं।
v इन चित्रों में मेंढक, बड़ी आकृतियाँ, छिपकली और गोह की आकृति है।

बोतल्दा

v यह स्थल खरिया से 8 किमी. दूर बस मार्ग पर स्थित एक गाँव है।
v यहाँ के पहाड़ में एक गुफा के आसपास चटान पर मानव, पशु, सरीसृप आदि का अंकन हुआ है।
v ये आदि मानव के द्वारा चित्रित है और गेरूए रंग में अंकित है।

टीपाखेल

v यह रायगढ़ शहर से 12 किमी. दूर उत्तर-पश्चिम में स्थित है।
v गाँव के समीप की पहाड़ी पर आदिम मानवों द्वारा चित्रांकित पशुओं एवं मानव के चित्र अंकित हैं।
v यहाँ एक जलाशय है, जो मनोहर है।

ताला

v सिमगा के पास स्थित ताला तान्त्रिक मूर्तियों के लिए जाना जाता है। यह पुरात्विक महत्त्व का स्थल है।

सोमनाथ

v रायपुर जिले में स्थित सोमनाथ विशाल शिवलिंग के लिए जाना जाता है।
v यहाँ शिवजी का मन्दिर तथा अन्य देवताओं की प्रतिमाएँ दर्शनीय हैं।

v बिलासपुर से दक्षिण दिशा की और ताला गाँव में उत्खनन से प्राप्त देवरानी जेठानी मन्दिर के अलावा भगवान शंकर की विशाल मूर्ति दर्शनीय है।
v उत्खनन में छठवीं शताब्दी का एक विशाल मन्दिर मिला है, जिसके दरवाजे व खम्भों में शंकर की कथा मूर्ति के रूप में उकेरे गये हैं जो पर्यटकों के लिए विशेष रूप से दर्शनीय हैं।
v ताला की सबसे महत्त्वपूर्ण मुर्तिकला लाल बलुआ पत्थर से निर्मित दो मीटर ऊँची रुद्रशिव की मूर्ति है।
v यह एक विशिष्ट मूर्ति है जो पुरातत्त्व के इतिहास में और कहीं प्राप्त नहीं हुई।

डोंगरगढ़

v राजनांदगाँव से 57 किमी. दूर बम्बई-हावड़ा मार्ग पर स्थित डोंगरगढ़ में पहाड़ों के ऊपर माँ बम्लेश्वरी देवी का बड़ा मन्दिर और पहाड़ी के नीचे माँ बम्लेश्वरी का एक छोटा मन्दिर श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केन्द्र है।
v ये दोनों मन्दिर प्राचीन काल के वास्तुकाल के उत्कृष्ट नमूने हैं।
v नवरात्र में यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है। यह एक शक्ति पीठ है।

खैरागढ़

v राजनांदगाँव से 40 किमी दूर खैरागढ़ भारत का एकमात्र संगीत एवं कला विश्वविद्यालय है, जहाँ देश-विदेश से संगीत कला प्रेमी विद्यार्थी आते हैं।
v यहाँ दन्तेश्वरी मन्दिर एवं वीरेश्वर महादेव का मन्दिर है।
v इसे एशिया में एक मात्र संगीत महाविद्यालय होने का गौरव प्राप्त है।

नारायणपाल

v बस्तर जिले के उत्तरी भाग में चित्रकूट के विपरीत नारायणपाल स्थित है।
v नारायणपाल में 6वीं शताब्दी का प्राचीनतम विष्णु मन्दिर है।
v यहाँ का विष्णु मन्दिर भारतीय पुरातत्त्व का स्मारक है।

चित्रकोट जलप्रपात

v यह स्थान रायपुर से 340 किमी तथा जगदलपुर से 40 किमी दूर स्थित है।
v बस्तर में जलप्रपात की लम्बी शंृखला है। विश्व प्रसिद्ध नियाग्रा के लघु रूप चित्रकोट जलप्रपात में उठते हुए जलकाणों पर सूर्य किरणों से बनते इन्द्रधनुषीय रंग पर्यटकों के मन को मोह लेते हैं।

पचराही

v कबीरधाम जिले में स्थित पचराही मध्य भारत में एक महत्त्वपूर्ण पुरातात्विक केन्द्र है।
v पचराही शब्द पाँच रास्तों या मार्ग से निकला शब्द है। यह पाँच केन्द्रों को जोड़ता है जिसमें रतनपुर, मण्डला, शासपुर, भोरमदेव और लांजिका हैं।
v यह स्थल मैकाल पर्वत शंृखला में स्थित है।
v यहाँ पर बुद्ध तथा जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। जो 9वीं से 13वीं सदी के मध्य की है।

तुर्रीधाम

v छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा में शिवजी के मन्दिर के लिए प्रसिद्ध यह स्थल अपने पुरातात्विक महत्त्व के लिए भी जाना जाता है।
v महाशिवरात्री पर तीन यहाँ दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है।

v जो की बस्तर में स्थित है का नाम वहाँ पर बसी हुई देवी-दन्तेश्वरी देवी से निकला है जो कि देवी शक्ति (शक्ति) के अवतार के रूप में पूजी जाती हैं। इसे हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार 52 पवित्र शक्ति पीठों में से एक माना जाता है।
v भगवान राम, महाकाव्य रामायण के नामक ने अपने 14 सालों के वनवास के दौरान यहाँ शरण ली थी, ऐसा माना जाता है।
v विभिन्न समय पर यह क्षेत्र नाग, सातवाहन और नल वंश के द्वारा शासित किया गया है।
v 63 शताब्दी ई. में, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के निशान यहाँ देखे गये हैं।
v पहाड़ी मैना और जंगली भैंसे से सहित दन्तेवाड़ा के जंगल वन्य जीवन की कई प्रजातियों के लिये घर है।
v यह क्षेत्र कई आदिवासी समूहों का निवास हैं-जिनमें मारिमा, मुरिया, धुर्वा, हलबा, भत्रा और गोड़ खास है।